मेरा भी इतिहास सुनो

अनिल चमड़िया
इतिहास में भविष्य की लड़ाइयां चलती रहती हैं, क्योंकि वर्तमान का निर्माण इतिहास के जरिए ही होता है. लेकिन अपनों के वर्तमान के इतिहास की अजीब विडंबना है. इतिहास में जो आर्थिक-सामाजिक शोषण के प्रतीक रहे हैं, उन्हें भुला देने और आर्थिक-सामाजिक शोषण वाली व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वालों को उस इतिहास को अपना इतिहास मानकर स्वीकार करने की कोशिश की जाती है, जबकि आर्थिक-सामाजिक शोषण के खिलाफ एक चेतना आकार ले चुकी है.

भारत के समकालीन इतिहास पर एक नजर डालें तो राष्ट्र और धर्म की आड़ में सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व जमाने और जमाए रखने का इतिहास है, और राष्ट्र और धर्म का एक ही अर्थ है वर्चस्व की सत्ता. इसीलिए हिन्दुत्व और राष्ट्र की अखंडता का आक्रमण एक ही दिशा से दिखता रहा है. जो लोग हर वक्त राष्ट्र के टूटने का खतरा जाहिर करते हैं, और दूसरे को राष्ट्र विरोधी बताते हैं, उनकी ध्वनि पर गौर करें. एक तो उसमें अपना सब कुछ छिन जाने का डर और बौखलाहट होती है, तो दूसरा वे मानते हैं कि सवाल उठाने वाले को अपने इतिहास का बोध हो रहा है. इसीलिए आक्रामकताएं चरम पर हैं.


महाराष्ट्र की नई घटनाएं तो महज एक उदाहरण हैं. रट्टामार राष्ट्रवाद इतिहास बोध और चेतना है. वर्तमान से उसका जुड़ाव दिखना चाहिए. इतिहास जो रटवा कर जाता है, उससे चेतना का स्थानापन्न नहीं किया जा सकता. इतिहास रटवाया जाता है कि मंगल पांडेय ने अपने हिन्दू धर्म की अपवित्रता की कोशिश से आक्रोशित होकर विद्रोह किया तो वह राष्ट्र प्रेम हो गया. यह हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की वैचारिकी का एक उदाहरण है. दूसरी तरफ, पेशवाओं की अमानवीय गुलामी और उत्पीड़न के खिलाफ आक्रोशित महारों ने ब्रिटिश सैनिक के रूप में जीत हासिल की तो वह आधुनिक राष्ट्र की भाषा में राष्ट्र विरोधी?

दरअसल, तर्क की गुंजाइश वहां होती है, जहां कि नये निर्माण की वैचारिकी की धारा मौजूद हो. वर्चस्व बनाए रखने की हर संभव कोशिश में तर्क की गुंजाइश नहीं होती. हमें इस पहलू पर गौर करना चाहिए कि साम्राज्यवाद और उपनिवेश एक समयकाल की भाषा है, और उनके संघर्षो की उपज राष्ट्रवाद वाला शब्द है. अतीत से लेकर अब तक सामाजिक और आर्थिक स्तर पर वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रवाद का इस्तेमाल करते नहीं दिखेंगे. यह हमेशा वर्चस्व की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वालों की तरफ से ही इस्तेमाल किया जाता है.

अम्बेडकर को याद करें तो उन्होने कहा कि ‘‘हजारों जातियों में विभाजित जनता एक राष्ट्र कैसे हो सकती है? सामाजिक और मानस शास्त्रीय अर्थ में हम एक राष्ट्र नहीं हैं, यह जितनी जल्दी हमारे ध्यान में आ जाएगा, हमारे लिए उतना हितकर होगा… ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलन में राष्ट्रवाद की बहस के कई आयाम देखने को मिलते हैं.

एक तरफ हिन्दुत्ववादी राष्ट्र की परिकल्पना है, तो दूसरी तरफ भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा है, तो तीसरी अंतरराष्ट्रीयवाद के भीतर राष्ट्रवाद की वैचारिकी है. एक दूसरे के सामने जातियां हमें दूसरे किसी तरह के भटकाव में जाने के बजाय इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि कैसे उन जातियों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर दिया गया है, जो आर्थिक-सामाजिक वर्चस्व के खिलाफ लड़ने वाली लड़ाकू जातियां रही हैं.

कोरेगांव की लड़ाई का इतिहास बताता है कि पेशवाओं का शासन और अंग्रेजी हुकूमत आमने-सामने थी. एक तरफ महार जाति के लड़ाकू सैनिक थे, तो दूसरी तरफ पेशवाओं की सेना में अरब, गोसाई और मराठा जाति के लोग थे. कोरेगांव की 200वीं सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम से जुड़ी हमले की घटना की पहली रिपोर्ट जब लोगों के सामने आई तो वह मराठा बनाम दलित के रूप में सामने नहीं थी. मराठा बनाम दलित की लड़ाई पेशवाई विचारधारा को सुरक्षित कर देती है.

पूरे देश के स्तर पर अध्ययन किया जा सकता है कि कैसे कृषक और श्रमिक जातियों को आमने-सामने खड़ा किया गया है. जाट भी अछूत माने जाते थे, लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि उन्हें दलित और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की सबसे आक्रामक जाति के रूप में देखा जाता है.

उत्तर ब्रिटिशकालीन भारत में राष्ट्रवाद की विचारधारा की जातिवादी रणनीति को समझने के लिए एक तो वीर भारत तलवार द्वारा संपादित पुस्तक ‘झारखंड का आंदोलन’ (खंड-1) को पढ़ा जा सकता है, और दूसरे डॉ. पुण्यव्रत गुण का छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के साथ बीते कुछ सालों के दस्तावेज देखे जा सकते हैं. आकार पर भारी सरोकार हम यह देख सकते हैं कि हाल के वर्षो में कैसे पहले मराठा बनाम दलित की एक पृष्ठभूमि खड़ी हुई है. बुद्धि यही है कि कैसे अपनी विरोधी ताकत का इस्तेमाल विरोधियों की आपसी टकराहट में बदल कर किया जाए.

यह सच है कि आर्थिक-सामाजिक उत्पीड़न के बीच यह तुलना की जाए कि उनमें से कौन लड़ाई के लिए ज्यादा प्रेरक साबित होती है, तो भारतीय समाज में सामाजिक उत्पीड़न का नम्बर पहले आता है. महज आठ सौ महार सैनिकों ने 28,000 सैनिक को टिकने नहीं दिया तो दोनों पक्षों के सरोकारों को समझा जा सकता है. इस ताकत की उन्हें पहचान है, जो इतिहास का इस्तेमाल अपने लिए करने की सबसे ज्यादा चालाकियां बरतते हैं. हम यह पाते हैं कि कैसे हिन्दुत्ववादी श्रमिक और कृषक जाति समूहों में एक दो जातियों का चयन करता है, उनके भीतर झूठा जातीय गौरव पैदा करता है, जिसका राजनीतिक उद्देश्य हिन्दुत्ववाद पर आधारित होता है.

चुनाव के दौरान हम जिसे सोशल इंजीनियरिंग के रूप में देखते हैं,वास्तव में वह इंजीनियरिंग यही है कि एक झूठे इतिहास बोध के जरिए एक श्रमिक और कृषक समूह में वर्णवाद से जुड़े जातिवाद को बारूद की तरह भरा और उन्हें दूसरी श्रमिक और कृषक जाति के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए. इसमें राष्ट्र और धर्म के हथियार ही सबसे कारगर साबित होते हैं. दूसरी तरफ, जब कोरेगांव में अपने इतिहास बोध की चेतना से लैस जाति समूह जमा होता है, तो वह राष्ट्र विरोधी माना जाता है.

लेकिन हमें गौर करना चाहिए कि गुजरात में जैसे कृषक और श्रमिक जातियों के रूप में पटेल, पिछड़े और दलित जिस तरह से वर्चस्व को चुनौती दे रहे ह. दरअसल, वह पूरे देश के लिए एक संकेत है. कोरेगांव में हमले के और तीखा होने के पीछे इस संकेत के खतरे की सही समझ है. दलित-अल्पसंख्यक उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं, तो उसके सामने किन्हें खड़ा किया गया है, यह समझ ही दलित आंदोलन को विस्तार देगा.

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