मैनपाट में आदिवासियों का राइस-ग्रेन बैंक

मैनपाट | एजेंसी: छत्तीसगढ़ के मैनपाट में पांच गांवों के आदिवासियों ने अपना राइस और ग्रेन बैंक बना लिया है. इतना ही नहीं ये हर साल कार्ययोजना बनाते हैं और अपना बजट भी तैयार करते हैं.

सूबे की सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली पीडीएस के तहत गरीबों को अनाज देने की योजना भले ही चला रही है, लेकिन जब इसका फायदा नहीं मिला तो इन्होंने खुद ही राइस और ग्रेन बैंक की स्थापना कर ली.

ब्याज के पैसे से गरीब और प्रतिभावान बच्चों को पढ़ाया जाता है. इसके साथ ही यह योजना भी बनाई जाती है कि कि नए सदस्य जोड़ने के लिए कब क्या करना है. यही वजह है कि अब ये गांव विकास के लिए सरकार पर निर्भर नहीं है, गांव के कई निर्माण कार्यो को इन गांवों ने अपने जमा किए गए पैसों से पूरा किया है. इन आत्मनिर्भर गांवों की तर्ज पर कुछ और गांव भी कतार में खड़े हैं.

छत्तीसगढ़ के मैनपाट में आदिवासियों की पहल सबसे अनूठी है. रोजाना खाना बनाने से पहले एक मुट्ठी चावल जमा कर यहां पांच ग्राम पंचायत के लोगों ने राइस बैंक ही बना लिया है. इनके पास औसतन हमेशा 50 क्विंटल से अधिक चावल हमेशा मौजूद रहता है और जरूरतमंद को तत्काल चावल दिया जाता है. इसके साथ ही चावल बेचकर समुदाय के प्रतिभावान बच्चों को पढ़ाया भी जा रहा है.

छत्तीसगढ़ के शिमला के रूप में प्रसिद्ध मैनपाट में प्राकृतिक सौंदर्य के अलावा आदिवासियों की एक पहल ऐसी है जो इस स्थान को खास बनाती है. यह बैंक मांझी जनजाति के लोगों ने बनाया है. इसकी वजह यह थी कि इन्हें तमाम योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा था.

इस इलाके में गरीबी और बेरोजगारी के कारण कई घरों में चूल्हा तक नहीं जल पाता था. ऐसे में वर्ष 2009 में ग्राम केसरा, कुनिया, नर्मदापुर, लुरैना और बरिया ग्राम पंचायत के लोगों ने निर्णय लिया कि हर परिवार की महिला रोज खाना बनाने से पहले एक मुट्ठी चावल निकालकर अलग रखेगी. सप्ताह में जितना चावल होता उसे शनिवार को एक जगह एकत्र किया जाता था. इसी चावल को जमा कर राइस बैंक बनाया गया और आज उनके पास 50 क्विंटल से अधिक का स्टॉक है.

वहीं पुरुषों ने ग्रेन बैंक की स्थापना की है. इसके तहत सभी साल में एक बार सात किलो धान एक जगह जमा करते हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि अब समुदाय के किसी भी व्यक्ति को चावल की जरूरत पड़ती है तो वह दुकान नहीं, बल्कि राइस बैंक जाता है.

राइस बैंक की अध्यक्ष मंजू मांझी ने बताया कि किसी के घर में शादी या अन्य आयोजन होने पर भी वे सहायता करते हैं. इसी महीने ग्राम नर्मदापुर में चार शादियां हुईं. इसमें जितना भी चावल लगा, बैंक ने दिया. इतना ही नहीं रिवाज के हिसाब से कन्यादान के लिए धान बैंक ने ही दिया.

ग्रेन बैंक के अध्यक्ष चंद्रबली बताते हैं कि उनके पास करीब 50 क्विंटल धान है. बैंक के सदस्यों ने बाकायदा लेन-देन का नियम भी बनाया है. इसके मुताबिक जरूरत पड़ने पर एक व्यक्ति को 10 किलो चावल दिया जाता है. साल भर में उसे 12 किलो चावल लौटाना होता है. अगर वह दो किलो अधिक नहीं दे पाता है तो भी इसे स्वीकार कर लिया जाता है. ब्याज के रूप में मिलने वाले अधिक चावल को बेचकर प्रतिभावान बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है.

राइस बैंक स्थापना की परिकल्पना मैनपाट के जनपद उपाध्यक्ष भीनसरिया राम मांझी की है. वे बताते हैं कि मांझी जनजाति में काफी गरीबी है. उनके पास गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए बनने वाला लाल कार्ड भी नहीं है. ऐसे में शासन की योजनाओं का भी लाभ नहीं ले पाते. कार्ड बनवाने के लिए अधिकारियों से कई बार कहा गया लेकिन किसी ने नहीं सुना. ऐसे में राइस बैंक और ग्रेन बैंक की पहल से समुदाय में कोई परिवार भूखा नहीं सोता.

भीनसरिया राम मांझी ने हाल के ही एक वाकये को याद करते हुए बताया कि नर्मदापुर का नैहर मांझी परेशान हालत में शाम को बैंक पहुंचा. उसके घर में मेहमान आए थे, लेकिन रात में न तो खुद के खाने के लिए चावल था और न ही मेहमानों के लिए. ऐसे में उसे तत्काल चावल दिया गया.

राइस बैंक और ग्रेन बैंक मैनपाट जनपद के हर पंचायत में खुले, इसके लिए काम शुरू हो गया है. लोगों को इससे हो रहे लाभ की जानकारी दी जा रही है. बहरहाल, सूबे के ये गांव और यहां निवास करने वाले आदिवासी ग्रामीण आज अपना बजट तैयार कर आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं.

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