मी-टू से लेकर बगलों तक

सुनील कुमार
आज जब चारों तरफ महिलाओं के शोषण के खिलाफ मी-टू के नारे लग रहे हैं, और आरोपों से घिरे हुए बहुत से लोगों को अपने काम-धंधे और कुर्सी से, चाहे कुछ वक्त के लिए, अलग होना पड़ रहा है, तब महिलाओं से जुड़े कुछ और मुद्दों पर चर्चा जरूरी है जो कि पिछले दस-बीस बरस के नहीं हैं, बल्कि सैकड़ों बरस के हैं.

समाज में महिलाओं को इतने किस्म के पुरूषवादी प्रतिबंधों से इस तरह जकड़कर रखा गया है कि वे खुद ये नहीं समझ पातीं कि वे जकड़ी हुई हैं. ये प्रतिबंध महिलाओं के तकरीबन पूरे ही तबके को सुहाने भी लगते हैं, और उन्हें लगता है कि यह उनके महत्व पाने का एक संकेत और सुबूत है.


बहुत से देशों में मुस्लिम महिलाओं के बदन और चेहरों को तरह-तरह से ढांककर रखने के ऐसे रिवाज हैं कि जिनके खिलाफ योरप के कुछ देश कानून भी बना चुके हैं कि उनके समाज में बुर्के जैसे कपड़ों से ढंकी हुई महिलाएं समरसता पैदा नहीं कर पाती हैं, और इतनी अलग-थलग दिखती हैं कि वह समाज के लिए एक समस्या की बात है.

लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम महिलाओं का एक हिस्सा ऐसे देशों में लगातार ऐसे कानूनों को चुनौती देता है और बुर्के या हिजाब, नकाब जैसे कपड़ों को पहनने की अपनी आजादी को अपना बुनियादी हक बताता है. जब खुद महिलाएं ऐसे पर्दे को पहनने का हक मांगती हैं, तो यह गलतफहमी पैदा होती है कि यह उनके हक में है.

जबकि हकीकत यह है कि सदियों से उन्हें इस तरह रखा गया है कि वे इसके भीतर अपने को महफूज करने लगी हैं, धार्मिक और सांस्कृतिक रिवाज मानकर इसमें शायद खुश रहने लगी हैं.

इस बारे में कुछ हफ्ते पहले मैंने इसी जगह लिखा भी था कि जिस तरह स्टॉकहोम में बैंक लुटेरों की कैद में हफ्ते भर रहने वाले लोग धीरे-धीरे उनको चाहने लगे थे, उनको पसंद करने लगे थे और उनसे आजाद होना ही नहीं चाहते थे.

मी-टू
मी-टू

यह नौबत 1983 में स्वीडन के स्टॉकहोम में आई थी जहां बैंक लुटेरों ने चार कर्मचारियों को बैंक की ही तिजोरी के कमरे में कैद रखा था, और जब वे रिहा किए गए तो उन्होंने इन डकैतों के खिलाफ मुंह खोलने से मना कर दिया था, अदालत में इनके खिलाफ गवाही नहीं दी थी, और वे सार्वजनिक रूप से इन लुटेरों की कानूनी मदद करने के लिए चंदा इकट्ठा करने लगे थे.

बहुत से मामलों में ऐसा होता है, राजस्थान में अभी कुछ दशक पहले तक मर्द महिलाओं को ऐसे झांसे में रखते थे कि पति के गुजरने के बाद वह उसकी चिता पर सती हो जाएगी, तो स्वर्ग जाएगी. बहुत सी महिलाएं अपनी मर्जी से सती हो जाती थीं, क्योंकि उन पर ऐसा सामाजिक दबाव रहता था कि अगर वो ऐसा नहीं करेंगी, तो शायद वे सती होने वाली महिलाओं के मुकाबले कम पतिव्रता कहलाएंगी.

ऐसा सामाजिक दबाव महिलाओं को अनंतकाल से एक झांसे में रखते आया है, और वह झांसा पढ़ाई-लिखाई या आधुनिकता के साथ घट नहीं रहा है, बल्कि बढ़ते चल रहा है, और महिलाएं उसे अपना हक समझने लगी हैं, बजाय बोझ समझने के.

अभी कुछ दिन पहले ही भारत की सर्वोच्च अदालत ने केरल के एक विख्यात मंदिर, सबरीमाला, में महिलाओं के प्रवेश पर चली आ रही पाबंदी को खत्म किया है. अब हाल यह है कि देश का सबसे शिक्षित यह राज्य इस फैसले के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन ही देख रहा है.

शिवसेना तो अपनी पहचान और अपने वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए इस फैसले के खिलाफ सामूहिक आत्महत्या का फतवा दे वह तो समझ में आता है, लेकिन यह समझ नहीं पड़ता कि सबसे शिक्षित प्रदेश की महिलाएं अपने हक के खिलाफ जुलूस कैसे निकाल सकती हैं. यह स्टॉकहोम सिन्ड्रोम की एक और मिसाल है, बुर्के की तरह.

अब आज के इस मुद्दे पर खुलकर कुछ साफ-साफ बात की जाए, तो मर्दों के दबदबे वाली इस दुनिया में जगह-जगह महिलाओं पर खूबसूरती के ऐसे पैमाने लादे गए हैं जिससे कि वे अपनी रोज की जिंदगी का एक खासा हिस्सा अपने आप पर ऐसे बर्बाद करती हैं कि वे मर्दों के बनाए पैमानों पर अधिक खूबसूरत साबित हों, और फिर चाहे इसकी वजह से उनकी उत्पादकता ही कम न हो जाए.

महिलाओं के कपड़ों से लेकर उनके बाकी फैशन तक, और उनके बदन के रखरखाव तक इतने किस्म के पैमाने गढ़ दिए गए हैं कि वे अपने बदन के बाल साफ करने के लिए तरह-तरह से खर्च करने को मजबूर रहती हैं, वक्त लगाने को मजबूर रहती हैं. उनके कपड़ों के फैशन, उनके गहनों के फैशन से लेकर बालों और नाखूनों के रखरखाव तक इतने किस्म से उन्हें यह सुझाया जाता है कि वे किस तरह बेहतर दिख सकती हैं.

अभी कुछ वक्त पहले तक का हिन्दुस्तान देखें तो परंपरागत गहने ऐसे रहते थे कि महिलाएं उन्हें पहनकर चलें तो वे बजें, ताकि बाकी लोगों को उनके आने-जाने का पता चल जाए. उनके कई गहने हथकडिय़ों और बेडिय़ों सरीखे रहते थे, जो अब शहरीकरण के साथ-साथ हल्के होते चले गए हैं, और महिला इस पारिवारिक दबाव में भी रहती थी कि जान चली जाए पर गहने न जाएं.

यह परिवार के मर्दों के लिए एक किस्म से चलती-फिरती तिजोरी भी रहती थी कि तिजोरी से तो आसानी से चोरी हो सकती है, महिला के बदन पर गहने अधिक सुरक्षित रहेंगे.

लेकिन अभी दुनिया के विकसित हिस्से में जो प्रमुख, चर्चित, और ग्लैमर से जुड़ी महिलाएं हैं उनमें से कुछ ने खुलकर इस बात की वकालत की है कि महिलाओं पर से बदन के बाल साफ करने जैसी मर्दाना उम्मीदें खत्म होनी चाहिए, और उन्होंने विरोध में अपने खुद के बदन दिखाने शुरू कर दिए हैं कि किस तरह वे खुद अब ऐसी उम्मीद के खिलाफ चल रही हैं. और यह कोई नई बात भी नहीं है, आज से कोई बीस बरस पहले हॉलीवुड की एक विख्यात अभिनेत्री जुलिया रॉबर्ट्स ने ऑस्कर फिल्म समारोह के फोटोग्राफी के लिए रखे गए हिस्से, रेट कॉर्पेट पर अपनी बांहें उठाकर बालों वाली बगलें दिखाई थीं, और महिला से उम्मीद के सामाजिक दबाव का विरोध किया था.

लेकिन हालत यह है कि अभी दुनिया के एक बड़े खेल ब्रांड के इश्तहार में जब एक स्वीडिश मॉडल ने अपने बालों वाले पैरों के साथ मॉडलिंग की, तो उसे सोशल मीडिया पर बहुत लोगों ने बलात्कार की धमकी तक दी. उसने अपने इंस्टाग्राम पेज पर अपनी इस तस्वीर के साथ लिखा कि उसे अपने मैसेज बॉक्स में बलात्कार की धमकियां मिल रही हैं और वह यह कल्पना भी नहीं कर पा रही है कि जिंदगी में फैशन की सहूलियतें जिन महिलाओं को नहीं है, वे कैसे जीती होंगी.

हिन्दुस्तान में महिलाओं के फैशन देखें तो जाने कब फैशन उद्योग में या समाज ने उन पर तरह-तरह के कपड़ों को लेकर तरह-तरह के पैमाने लाद दिए. और इन पैमानों को ढोते हुए ये महिलाएं यह भी नहीं समझ पाती हैं कि यह उनके खिलाफ हैं, उनकी खूबसूरती की तारीफ नहीं. और दिक्कत यह है कि जिन प्रदेशों में चेहरा ढांककर रखने का रिवाज है, उन प्रदेशों में भी महिलाओं के कपड़े कुछ दूसरे हिस्से उघाड़कर दिखा सकते हैं, लेकिन उनसे चेहरा ढांककर रखने की उम्मीद की जाती है.

दूसरी तरफ ऐसे ही दकियानूसी और पाखंडी समाजों में लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाई जाती है, जबकि वह बदन को कुछ दूसरे हिन्दुस्तानी कपड़ों के मुकाबले कुछ अधिक ढांककर रखती है.

महिलाओं से जुड़े कुछ मुद्दों पर जब आज जागरूकता के आंदोलन चल रहे हैं, तो कुछ दूसरे पहलुओं पर भी कम से कम चर्चा तो होनी ही चाहिए. मी-टू भी अमरीका से शुरू होकर मुम्बई तक पहुंचा है, और महिलाओं पर लादे गए दूसरे कई किस्म के मर्दाना पैमानों का विरोध भी पश्चिम से निकलकर पूरब तक आ सकता है, और महिलाओं को खूबसूरती के सामाजिक दबाव से आजाद कर सकता है.

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