अस्पतालों में दवा पर होता है केवल 14 % खर्च

वास्को-द-गामा | इंडिया साइंस वायर: देश के जिला अस्पतालों में दवा और दूसरी सुविधाओं पर केवल 14 प्रतिशत रकम खर्च होती है. इसके उलट 53 प्रतिशत रकम मानव संसाधन पर खर्च हो जाती है. जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर देश की बहुसंख्य आबादी आश्रित है. लेकिन जिला अस्पतालों की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन पर होने वाले कुल का 53 प्रतिशत हिस्सा मानव संसाधन पर ही खर्च हो जाता है और दवाओं एवं अन्य जरूरी साजो-सामान की आपूर्ति उपेक्षित रह जाती है.

भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में यह बात उभरकर आई है. अध्ययनकर्ताओं ने पाया है कि संसाधनों की कमी के कारण इन अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत संतोषजनक नहीं हैं. अध्ययन के दौरान उत्तर भारत के सार्वजनिक जिला अस्पतालों में माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च की पड़ताल करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं.


अध्ययनकर्ताओं के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं में बहुत बड़ा व्यय वेतन और अन्य भुगतान प्रणाली पर खर्च हो जाता है तथा दवा व बीमारी की पहचान करने जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए बहुत कम राशि बच पाती है. अस्पतालों के कुल व्यय का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा मानव संसाधन पर खर्च हो जाता है, जबकि दवा और अन्य सुविधाओं के लिए सिर्फ 14 प्रतिशत खर्च होता है.

चंडीगढ़ स्थित स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान,रोहतक स्थित पंडित बी.डी. शर्मा स्नातकोत्तर चिकित्सा विज्ञान संस्थान और कांगड़ा के डॉ. राजेद्रप्रसाद शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयके शोधकर्ताओं द्वारा किया गया यह अध्ययन शोध पत्रिका इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित किया गया है.

शोधकर्ताओं के अनुसार है कि उत्तर भारत के जिला अस्पतालों में आवश्यक बुनियादी दवाओं तथा बीमारियों की पहचान के लिए किए जाने वाले नैदानिक विश्लेषणों पर बहुत कम खर्च किया जाता है. हालात ऐसे हैं कि इन अस्पतालों में ज्यादातर अनिवार्य जीवनरक्षक दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पाती हैं.

उत्तर भारत के जिला अस्पतालों में माध्यमिक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला कुल वार्षिक खर्च लगभग 11.5 करोड़ रुपये आंका गया है. अस्पताल में एक दिन के लिए भर्ती होने पर प्रति मरीज 844 रुपये, प्रति ऑपरेशन 3,481 रुपये तथा बाह्यरोगी परामर्श के लिए 170 रुपये खर्च होते हैं.

भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक तीन तरह की स्वास्थ्य सेवा प्रणालियां प्रचलित हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों में उप-केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व शहरी क्षेत्रों में परिवार कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्रदान की जाती हैं. माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं के अन्तर्गत जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आते हैं. तृतीयक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में विशिष्ट विशेषज्ञता वाले अस्पताल आते हैं.

अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश पर व्यापकरूप से ध्यान देने की आवश्यकता है. स्वास्थ्य सेवाओं में व्या वसायिकता, जवाबदेही और निष्प क्षता के साथ कारगर मानव संसाधन प्रबंधन नीति और सिद्धांतों की व्य वस्था् होनी चाहिए. साथ ही माध्यमिक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ सुदृढ़ता से एकीकृत करने की भी जरूरत है, जिससे अवसंरचना, मानव संसाधन तथा औषधियों और उपकरणों समेत पर्याप्त संसाधनों के साथ बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा सकें.

यह अध्ययन दवाओं एवं अन्य नैदानिक विश्लेषण सुविधाओं के लिए न्यूनतम खर्च को बड़े पैमाने पर अनिवार्य रूप से निर्धारित करने की आवश्यकता पर भी जोर देता है. अध्ययनकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन अस्पतालों की सीमाओं को समझते हुए उनकी दक्षता बढ़ाने में सहायक हो सकता है. स्वास्थ्य सेवाओं के समुचित व्यय प्रबंधन के लिए भी इस अध्ययन के निष्कर्षों का इस्तेमाल करके मौजूदा अनुमानों को संशोधित किया जा सकता है और लागत का अनुमान लगाया जा सकता है. इनसे विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्य-प्रभावी विश्लेषण करने में भी मदद मिल सकती है. अध्ययनकर्ताओं की टीम में डॉ. शंकर प्रिंजा, दीपक बालासुब्रमण्यम, गुर्सिमेर जीत, रमेश वर्मा, दिनेश कुमार, पंकज बहुगुणा, मनमीत कौर और राजेश कुमार शामिल थे.

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