आत्मनिर्भरता से आयात की ओर

ईएएस सर्मा
भारत नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में काफी पहले ही प्रवेश कर गया था. डा. होमी जे भाभा ने भारत में नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में शोध की शुरूआत की थी. उन्होंने यह किया था 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआइएफआर) की स्थापना के जरिए. उन्होंने आगे चलकर 1954 में ट्राम्बे में एटमिक इनर्जी इस्टेबलिशमेंट की स्थापना की ताकि बिजली पैदा करने के लिए नाभिकीय ऊर्जा के उपयोग के प्रयास को तेज किया जा सके. इस तमय तक प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एटमी ऊर्जा विभाग काम करना शुरू कर चुका था.

नाभिकीय बिजली उत्पादन
भारत ने अपना पहला नाभिकीय बिजलीघर 1963 में महाराष्ट्र में तारापुर में कायम किया था. 410 मेगावाट का यह बिजलीघर अमरीका के साथ समझौते के हिस्से के तौर पर लगाया गया था. यह बिजलीघर बॉयलिंग वाटर रिएक्टरों पर आधारित था और इसमें अमरीका से आयातित संवर्द्धित यूरेनियम ईंधन का उपयोग किया जाता था. इस परियोजना से 1969 में वाणिज्यिक स्तर पर बिजली उत्पादन शुरू हो गया. इस तरह तारापुर से नाभिकीय ऊर्जा के विकास के भारत के प्रयासों की शुरूआत हो गयी.


शुरूआत में एटमी ऊर्जा विभाग नाभिकीय विद्युत विकास कार्यक्रम को लागू कर रहा था. यह स्थिति 1987 में एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम के रूप में न्यूक्लिअर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना तक बनी रही.

डा. भाभा का यह सपना था कि भारत को नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना चाहिए. उसी के हिसाब से भारत ने एक तीन चरणों का नाभिकीय विद्युत विकास कार्यक्रम स्वीकार किया था, जो घरेलू तौर पर निर्मित रिएक्टरों तथा घरेलू संसाधनों से प्रसंस्कृत ईंधन से संचालित होना था.

इसका पहला चरण घरेलू रूप से निर्मित प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टरों पर आधारित था, जिनमें घरेलू स्रोतों से हासिल प्राकृतिक यूरेनियम का ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाना था और घरेलू तौर पर उत्पादित हैवी वाटर का मॉडरेटर तथा शीतकारक, दोनों के ही रूप में उपयोग किया जाना था. दूसरे चरण में, पहले चरण के इस्तेमालशुदा ईंधन से प्रथक्कृत प्लूटोनियम-239 का उपयोग घरेलू तौर पर विकसित फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में किया जाना था और इसके जरिए बिजली का उत्पादन किा जाना था. और भविष्योन्मुखी तीसरे चरण में इसकी कल्पना की गयी थी कि सागर तट की रेती से निकलने वाले थोरियम का कच्चे माल के तौर पर उपयोग किया जाएगा और इससे यूरेनियम-233 बनाया जाएगा, जिसका उपयोग बिजली के उत्पादन के लिए किया जाएगा.

अपनी स्थापना के बाद गुजरे पांच दशकों में एटमी ऊर्जा विभाग ने स्वदेशी प्रयास पर अपने भारी जोर के साथ, करीब 5,780 मेगावाट की नाभिकीय बिजली उत्पादन क्षमता स्थापित की है. बहरहाल, आज तक नाभिकीय बिजली हमारे देश में बिजली उत्पादन की कुल स्थापित क्षमता के सिर्फ 1.83 फीसद हिस्से के बराबर है और कुल बिजली उत्पादन के पहलू से, नाभिकीय बिजली का अंशदान सिर्फ 3.23 फीसद है.

आत्मनिर्भरता के रास्ते से दूर
1988 में भारत ने नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के रास्ते से दूर हटना शुरू किया. तत्कालीन सोवियत संघ के साथ तमिलनाडु में कुडमकुलम में 1000 मेगावाट क्षमता की दो इकाइयों की स्थापना के समझौते पर दस्तखत किए गए थे. यह परियोजना सोवियत निर्मित प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टरों के आधार पर खड़ी की जानी थी. इस परियोजना पर काम वास्तव में शुरू हुआ, 2002 में.

2005 में हुए भारत-अमरीका नाभिकीय समझौते के साथ, विभिन्न देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय समझौतों पर दस्तखत करने की शृंखला की शुरूआत हो गयी. इस तरह, दूसरे देशों से बहुत बड़े पैमाने पर नाभिकीय रिएक्टर तथा ईंधन के आयात के सिलसिले की शुरूआत हुई. इस तरह के द्विपक्षीय सौदों में रिएक्टरों तथा ईंधन, दोनों के ही मामले में, मूल्य निर्धारण के मामले में पारदर्शिता का अभाव होता है. इस तरह के द्विपक्षीय समझौतों से हमारे देश के लिए, रिएक्टरों की डिजाइन में सुरक्षा के उच्चतम मानकों के पालन की मांग करना भी मुश्किल हो जाता है. इस स्थिति को यह तथ्य और भी उलझा देता है कि नाभिकीय बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके लिए तैयार नहीं होती हैं कि उनके रिएक्टर की डिजाइन के दोषों के चलते अगर कभी फुकुशिमा जैसी महादुर्घटना घट जाती है, तो उसके लिए पूरी जवाबदारी स्वीकार करें.

नाभिकीय बिजली प्रौद्योगिकी की सुरक्षा का सवाल
पिछले छ: दशकों के दौरान, छोटी और बड़ी, सब मिलाकर बहुत सारी नाभिकीय दुर्घटनाएं हुई हैं. लेकिन, नाभिकीय उद्योग के गिर्द जिस तरह की गोपनीयता का पर्दा पड़ा रहा है, उसके चलते इनमें से अनेक दुर्घटनाओं की तो खबर ही नहीं निकली है. अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा प्रकाशित नाभिकीय दुर्घटनाओं की सूचियों के अनुसार, दुनिया भर में 30 से ज्यादा बड़ी नाभिकीय दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें कई-कई लोगों की जानें गयी हैं और 10 करोड़ डालर से ज्यादा की परिसंपत्ति का नुकसान हुआ है. इनमें से 9 दुर्घटनाएं बहुत ही गंभीर थीं और इनमें भी तीन, भारी तबाही करने वाली थीं. पहली, अमरीका में थ्री माइल आइलेंड (1979), दूसरी तत्कालीन सोवियत संघ में चेरनोबिल (1986) और तीसरी, जापान में फुकुशिमा (2011).

थ्री माइल आइलेंड की दुर्घटना ने अमरीका में कम से कम पंद्रह राज्यों को नयी नाभिकीय परियोजनाएं लगाए जाने पर औपचारिक रूप से अंकुश लगाने पड़े थे और देश भर में नाभिकीय बिजली के कार्यक्रम के विकास की गति बहुत ही धीमी कर दी थी. उधर चेरनोबिल के मामले में दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र को एक बहुत ही ऊंची लागत के मकबरे की शक्ल में दफ्र करना पड़ा था क्योंकि उसे पूरी तरह से विकीरण से साफ नहीं किया जा सका था.

जहां तक फुकुशिमा का सवाल है, दुर्घटनाग्रस्त रिएक्टर आज तक हर रोज 200 टन से ज्यादा रेडियो-एक्टिव पानी प्रशांत सागर में डाल रहे हैं. स्थानीय भूगर्भ जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं. हो सकता है कि जापान दशकों तक इन रिएक्टरों को विकीरण से साफ नहीं कर पाए और शायद उसे अंतत: इन रिएक्टरों को महंगे धातु के कवर से ढांपना पड़े ताकि आस-पड़ौस के क्षेत्र को रेडियोधर्मी विकीकरण से सुरक्षित किया जा सके.

नाभिकीय जवाबदारी का मुद्दा
कुछ अनुमानों के अनुसार, फुकुशिमा दर्घटना से निकलने वाली जवाबदारी साल में लाख चालीस हजार करोड़ रु. के बराबर बैठ सकती है. भारत को नाभिकीय रिएक्टरों की आपूर्ति कर रहे पश्चिमी बहुराष्ट्रीय निगम ऐसी भारी जवाबदारी स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं हैं. अगर भारत में स्थापित की जा रही किसी परियोजना में फुकुशिमा जैसी दुर्घटना हो जाती है, तो हमारी सरकार के लिए अपने सीमित बजटीय संसाधनों में से इस भारी जिम्मेदारी का बोझ उठाना मुश्किल हो जाएगा.

भारतीय संसद ने 2010 में जब असैनिक जवाबदारी विधेयक को स्वीकार किया था, वामपंथी पार्टियों के आग्रह पर ही, दुर्घटना की सूरत में जवाबदारी की सीमा को बढ़ाकर 30 करोड़ एसडीआर यानी आज की मुद्रा विनिमय दर पर करीब 2,830 करोड़ रु. किया गया था. फुकुशिमा दुर्घटना की जिस वास्तविक जवाबदारी की हम पीछे चर्चा कर आए हैं उसे देखते हुए, इस वैधानिक अधिकतम सीमा का अर्थ है, भारत के लिए रिएक्टरों की आपूर्ति करने वाले विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों का दुर्घटना की जवाबदारी से करीब-करीब सौ फीसद बरी कर दिया जाना, जबकि न सिर्फ यह कि ऐसी दुर्घटना की सरकारी खजाने को बहुत भारी कीमत अदा करनी पड़ेगी बल्कि इस तरह रिएक्टरों के आपूर्तिकर्ताओं को एक प्रकार से इसके लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा होगा कि रिएक्टर की डिजाइन में सुरक्षा विशेषताओं के मामले में यहां-वहां से कतरब्यौंत करें.

इंसानी भूल-चूक, मशीनी गड़बड़ी तथा प्राकृतिक आपदा आदि के चलते नाभिकीय परियोजना स्थलों पर रेडियोधर्मी रिसाव भी हो सकता है और बड़ी दुर्घटनाएं भी हो सकती हैं. नाभिकीय बिजलीघरों से रेडियोधर्मी रिसाव के अलावा नाभिकीय बिजली घर के लिए ईंधन के परिवहन के दौरान और जले हुए ईंधन के भंडारण के लिए अन्यत्र ले लाए जाने के दौरान भी, स्थानीय समुदाय को विकीरण की मार झेलनी पड़ सकती है. कम तीव्रता की रेडियोधर्मिता के प्रभाव में आने के लोगों के स्वास्थ्य पर दूरगामी दुष्प्रभाव हो सकते हैं. बड़ी दुर्घटनाओं की सूरत में दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र के आस-पास का बड़ा इलाका मार में आ सकता है.

अमरीका में इस तरह के संयंत्रों के मामले में जो क्षेत्र चयन के नियम बनाए गए हैं, वे इसका इशारा करते हैं कि इस प्रकार का प्रभाव, हवाओं की तीव्रता तथा दिशा को देखते हुए, करीब 80 किलोमीटर दूर तक जा सकता है. खबरों के अनुसार फुकुशिमा दुर्घटना से निकली रेडियोधर्मी सामग्री सुदूर अमरीकी पश्चिमी तट के करीब तक पहुंची है. नाभिकीय प्रौद्योगिकी से जुड़े जोखिमों को देखते हुए, निजी बीमाकर्ता नाभिकीय बिजलीघरों का बीमा करने के प्रति अनिच्छुक हैं और विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं इसके लिए ऋण सहायता मुहैया कराने के प्रति अनिच्छुक हैं.

एटमी ऊर्जा विभाग के आधीन है एटमी ऊर्जा नियमन बोर्ड
अपने वर्तमान स्वरूप में एटमी ऊर्जा नियमन बोर्ड, उस एटमी ऊर्जा विभाग के आधीन है, जिसकी गतिविधियों पर निगरानी रखने तथा नियमन करने की उससे अपेक्षा की जाती है. फुकुशिमा के बाद, नाभिकीय विद्युत प्रौद्योगिकी की सुरक्षा को लेकर उठी चिंताओं और स्वतंत्र नियमन लाने की जरूरत के चलते, सरकार ने संसद के सामने नाभिकीय सुरक्षा नियामक प्राधिकार विधेयक पेश किया था. संबंधित संसदीय स्थायी समिति ने 2012 में उक्त विधेयक पर विचार किया था और अनेक दूरगामी सिफारिशें की थीं ताकि प्रस्तावित नाभिकीय सुरक्षा नियामक प्राधिकार का सचमुच स्वतंत्र होना सुनिश्चित किया जा सके. लेकिन, न तो यूपीए सरकार ने उक्त कानून बनाने की जरूरत समझी और मौजूदा एनडीए सरकार ने.

फिलहाल स्थिति यह है कि नियमनकारी प्राधिकार को, इसकी पूरी स्वतंत्रता ही नहीं है कि वह मौजूदा संयंत्रों के मामले में या फिर नये लगाए जा रहे संयंत्रों के मामले में ही, सुरक्षा के पहलुओं पर एटमी ऊर्जा विभाग से सवाल कर सके. अपने वर्तमान स्वरूप में एटती ऊर्जा कानून एनपीसीआइएल की गतिविधियों के संबंध में जानकारी हासिल करने के नागरिकों के अधिकारों को अनुचित रूप से सीमित करता है. इससे नाभिकीय बिजलीघरों की सुरक्षा को लेकर, जनता की आशंकाएं और बढ़ जाती हैं.

हाल के दौर में योरपीय तथा अमरीकी नियमनकर्ताओं ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लगायी जा रही नाभिकीय परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर घटिया हिस्सों-पुर्जों का इस्तेमाल पकड़ा है. झूठे गुणवत्ता प्रमाणन तथा फर्जीवाड़े, इन दिनों अपवाद नहीं रहकर, नियम ही बन गए हैं. यह बहुत ही गंभीर मसला है जिसकी अनदेखी सरकार नही कर सकती है क्योंकि इससे बड़ी दुर्घटनाएं होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

नाभिकीय बिजली की कीमत
नाभिकीय बिजली की कीमत के कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन्हें आसानी से गिना नहीं जा सकता है. मिसाल के तौर पर अब तक ऐसी कोई ज्ञात प्रौद्योगिकी नहीं है जो संतोषजनक तरीके से नाभिकीय संयंत्रयों से पैदा होने वाले रेडियोधर्मी कचरे का निपटान कर सकती हो और इस कचरे के प्रबंधन से जुड़ी लागतों के संबंध में सिर्फ अटकलें ही लगायी जा सकती हैं. अपनी आयु पूरी कर चुके नाभिकीय बिजलीघरों को समेटने की लागत का अनुमान लगाना तो और भी कठिन है क्योंकि इस तरह के संयंत्रों के समेटे जाने का वैश्विक अनुभव दयनीय रूप से नगण्य है.

दुनियाभर में ज्यादातर नाभिकीय बिजलीघरों के लगाए जाने में, समय तथा कीमत दोनों के मामले में, आरंभिक अनुमान बहुत ही छोटे साबित हुए हैं. मिसाल के तौर पर फिनलेंड में फ्रांसीसी कंपनी अरेवा द्वारा लगाए जा रहे ओल्किलोटो रिएक्टर के मामले में, निर्माण की अवधि, 5 साल से बढक़र 13 साल पर पहुंच गयी है और लागत बढक़र तीन गुनी हो गयी है. इसके बाद भी इसकी कोई गारंटी नहीं है कि इस परियोजना में अभी और देरी नहीं होगी.

अरेवा तथा अन्य फ्रांसीसी कंपनी ईडीएफ और अमरीकी-जापानी कंपनियां, वेस्टिंगहाउस तथा तोशीबा भी, जो क्रमश: महाराष्ट्र में जैतापुर तथा आंध्र प्रदेश में कोव्वाडा में नाभिकीय बिजली परियोजनाएं लगा रही हैं, वित्तीय रूप से दबाव में हैं और इसमें शक है कि उनके लिए समय सरणी या लागत के अनुमानों पर कायम रहना संभव होगा. चूंकि भारत इस तरह के विदेशी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने की योजना बना रहा है, भारत में नाभिकीय की भावी दिशा अनिश्चित तथा बहुत ही महंगी रहने जा रही है.

दूसरे देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों के नाम पर एटमी ऊर्जा विभाग ने रिएक्टरों की कीमत और रिएक्टरों को चलाने के लिए जरूरी यूरेनियम की कीमत पर वार्ताओं के मामले में बहुत ही अपारदर्शी प्रक्रिया अपनायी है. दूसरे शब्दों में भारत, रिएक्टरों की आपूर्ति करने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों के ही रहमो-करम पर निर्भर होकर रह जाएगा और उसे इन निगमों द्वारा बताए जाने वाले दाम ही स्वीकार करने होंगे जिनका प्रतिस्पद्र्घी दाम होना कोई जरूरी नहीं है. ईंधन के मामले में, ईंधन कंपनियों के आपस में विलयों/ अधिग्रहणों का वैश्विक रुझान है, जो इजारेदारियां पैदा करने की ओर ले जाता है और ये इजारेदारियां ईंधन की कीमतें अपने हिसाब से थोप रही होंगी. ऐसे देखते हुए ये ऊंची कीमतें भी डालर में ही तय की जा रही होंगी, इन नाभिकीय बिजलीघरों की बिजली के दाम, घरेलू बिजली उपभोक्ताओं द्वारा आज भरी जा रही बिजली की औसत दरों से कई गुने ज्यादा बैठेंगे.

ऊर्जा सुरक्षा के लिए निहितार्थ
नाभिकीय बिजली परियोजनाएं एक स्थिर गति से बिजली पैदा करती हैं, जो ग्रिडों के संचालन में बेस लोड में अपना हिस्सा जोड़ता है. लेकिन, भारत की बिजली उत्पादन व्यवस्था में बेस लोड उत्पादन क्षमता जरूरत से ज्यादा है और इसके चलते नाभिकीय बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी असंतुलन को बढ़ाने का ही काम करेगी और यह पलटकर बिजली की समग्र इकाई लागत में बढ़ोतरी का ही काम करेगा. यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि नाभिकीय बिजलीघरों में उत्पादन आसानी नहीं घटाया जा सकता है और इसका नतीजा यह होगा कि हो सकता है कि उनके चलने की वजह से, अन्य अपेक्षाकृत कमखर्चीले बिजलीघरों को बंद करना पड़े. जाहिर है कि इसका बोझ बिजली के उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा.

नाभिकीय रिएक्टरों तथा यूरेनियम ईंधन, दोनों का विदेशी स्रोतों से बड़े पैमाने पर आयात, जिसकी कि फिलहाल योजना है, देश की ऊर्जा सुरक्षा को कमजोर कर देगा. इस तरह के आयातों के भारत के विदेश नीतिगत विकल्पों के लिए परोक्ष परिणाम भी होंगे. इतना ही नहीं कुछ पश्चिमी बहुराष्ट्रीय निगमों ने, जिनके पास ईंधन तैयार करने की सुविधाएं थीं, गंभीर आर्थिक तंगी के चलते अपनी ये सुविधाएं अन्य देशों को बेच दी हैं. ईंधन के स्रोतों को लेकर ऐसी अनिश्चितताओं को देखते हुए, भारत को इससे निकलने वाले रणनीतिक निहितार्थों को लेकर चिंतित होना चाहिए.

कोव्वाडा नाभिकीय विद्युत परियोजना
एनपीसीआइएल ने शुरूआत में गुजरात में मीठी विर्दी में 1000 मेगावाट की छ: इकाइयों पर आधारित नाभिकीय बिजली परियोजना लगाने का प्रस्ताव किया था. वेस्टिंगहाउस-तोशीबा ग्रुप के इस परियोजना के लिए रिएक्टरों की आपूर्ति करने की उम्मीद थी. बहरहाल, इस तरह की परियोजना से जुड़े जोखिमों को देखते हुए, इस परियोजना पर वहां की जनता के भारी विरोध को देखते हुए, बाद में एटमी ऊर्जा विभाग ने वेस्टिंगहाउस-तोशीबा से आंध्र प्रदेश में कोव्वाडा में अपने रिएक्टर लगाने के लिए कहा है. इसका निहितार्थ यह है कि मीठी विर्दी के लोगों की चिंताएं, कोव्वाडा के आस-पास रहने वाले लोगों की चिंताओं के मुकाबले ज्यादा वजन रखती हैं. इतना ही नहीं, मूल रूप से पश्चिम बंगाल में हरिपुर के लिए प्रस्तावित एक नाभिकीय विद्युत परियोजना के मामले में भी, जनता के विरोध को देखते हुए, केंद्र सरकार ने, आंध्र प्रदेश सरकार की मिलीभगत से परियोजना का ही आंध्र प्रदेश में ही एक तटीय स्थल के लिए तबादला कर दिया लगता है. इस तरह के निर्णय, कोव्वाडा के आसपास और आंध्र प्रदेश में ही अन्यत्र समुद्र तट पर स्थित जगहों में रहने वाले लोगों की चिंताओं के प्रति केंद्र तथा राज्य सरकार के असंवेनशील रुख को ही दिखाते हैं.

हालांकि, कोव्वाडा के मामले में गठित की गयी साइट सलैक्शन कमेटी ने कोव्वाडा के गिर्द 300 किलीमीटर तक के क्षेत्र में एक चौतरफा भूकंपीय अध्ययन की वकालत की थी, इस तरह का कोई भी अध्ययन नहीं कराया गया. इस क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में ही अनेक भूकंप आए हैं. एटमी ऊर्जा विभाग और एनपीसीआइएल के अगर सचमुच कोव्वाडा में तथा उसके गिर्द रहने वाले लोगों की सुरक्षा की चिंता होती, तो उन्हें इस क्षेत्र का विस्तृत भूकंपीय मूल्यांकन करना चाहिए था और जनता का विश्वास में लेना चाहिए था.

कोव्वाडा परियोजना 1,915 एकड़ में किसानों तथा परंपरागत मछुआरों व दस्तकारों को विस्थापित करेगी और खेती तथा मछलीपालन की गतिविधियों में खलल डालेगी.

इसके अलावा इस परियोजना के 1.5 किलोमीटर के दायरे में आने वाले पांच गांवों को ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ घोषित किया गया है, जहां लोगों को रहने की इजाजत नहीं होगी. और कोव्वाडा के 5 किलोमीटर के दायरे में, जिसे ‘‘स्टर्लाइज्ड जोन’’ घोषित किया गया है, 42 गांव आते हैं जहां इस परियोजना के चलते किसी विकास गतिविधि की इजाजत नहीं होगी. आखिर में 30 किलोमीटर के दायरे में, जिसमें ‘‘इमर्जेंसी प्लानिंग जोन’’ तथा ‘‘इंपैक्ट असेसमेंट जोन’’ शामिल हैं, एक लाख से ज्यादा लोगों को विकरण के संभावित खतरे का और आपात स्थिति में विस्थापन के खतरे का सामना करना पड़ रहा होगा. दूसरी ओर, परियोजना स्थल के करीब रहने वाले लोगों को, इस तरह के संभावित खतरों का सामना करने के बावजूद, शायद कोई मुआवजा नहीं मिलेगा. इस तरह कोव्वाडा परियोजना बहुत भारी मानवीय पीड़ा पैदा करने वाली है, जिसकी शासकों को कोई परवाह ही नहीं लगती है. दूसरी ओर इसमें शक है कि इस परियोजना से होने वाले मामूली लाभ भी कभी स्थानीय लोगों तक पहुंचेंगे.

इस तरह की परियोजनाओं से शायद पश्चिमी बहुराष्ट्रीय निगमों का जरूर फायदा होगा, जिनके लिए मुनाफादेह बाजार बनाया जा रहा होगा और भारत से बढक़र उनके अपने पितृदेश में, रोजगार के अवसर पैदा किए जा रहे होंगे! कोव्वाडा परियोजना की विडंबना यह है कि सरकार अग्रिम रूप से लोगों की जमीनें जबरिया अधिग्रहीत कर लेगी और इस तरह अभी से इस क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा में खलल डाल देगी, जबकि इस परियोजना को पूरा होने में दसियों साल लग सकते हैं!
निष्कर्ष

भारत में बिजली की आपूर्ति की व्यवस्था की अनेक अंतर्निहित अकुशलताओं को देखते हुए, समझदारी इसी में होगी कि सरकार पहले लागत-अनुकूल कुशलता सुधारों में निवेश करे ताकि मौजूदा आपूर्तियों के बरक्स बिजली की मांग को संतुलित करने की दिशा में बढ़ा जा सके. हाल के दौर में अक्षय ऊर्जा स्रोतों से इकाई बिजली उत्पादन की लागतें और खासतौर पर सोलर पीवी मोड्यूलों के मामले में ये लागतें उल्लेखनीय रूप से घट गयी हैं और सरकार के लिए यह संभव होना चाहिए कि अपनी नीतियों को इसके हिसाब से मोड़ सके कि मिसाल के तौर पर रूप टॉप सौर ऊर्जा उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा सके. ऐसी नीतियों के सामाजिक लाभ, नाभिकीय तथा अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की लागतों सामने बहुत भारी साबित होंगे.

(लेखक, पूर्व केंद्रीय विद्युत सचिव हैं उनके निजी विचार.)

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