फसल बीमा में यह लूट

आलोक प्रकाश पुतुल | रायपुर: छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने 2015 की कृषि फसल बीमा योजना के लगभग 18 करोड़ 43 लाख रूपए के बीमा दावों का भुगतान राज्य शासन के मद से देने का निर्णय लिया है. लेकिन 2014-15 में फसल बीमा की कई सौ करोड़ रुपये की निजी कंपनियों की लूट पर सरकार चुप्पी साधे हुये है. 2014-15 में राज्य के 9,74,199 किसानों ने क़रीब 17 लाख़ हेक्टेयर भूमि की फ़सल का बीमा कराया था, जिस पर निजी क्षेत्र की सात बीमा कंपनियों को 3.35 अरब रुपए से ज़्यादा की राशि का भुगतान प्रीमियम के तौर पर किया गया था.

इन कंपनियों ने बीमा और बैंकिंग के तमाम नियमों का उल्लंघन करते हुये न केवल मनमाने तरीके से किसानों से प्रीमियम की रकम वसूली, बल्कि सूखा के कारण बीमा की रकम बांटने की बारी आई तो पूरे राज्य में इन निजी कंपनियों ने अपनी तरह के फर्जी आंकड़े तैयार किये और मनमाने तरीके से भुगतान करते हुये करोड़ों रुपये का गोलमाल किया. हालांकि राज्य के कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का दावा है कि कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है, जबकि तमाम दस्तावेज़ों और आंकड़ों से साफ साफ जाहिर होता है कि फसल बीमा में सरकारी अफसरों की मिलीभगत से करोड़ों रुपये की लूट हुई है.

2014-15 की मौसम आधारित फसल बीमा योजना के अनुसार जुलाई, अगस्त और सितंबर में होने वाली बारिश को इस बीमा का आधार बनाया गया था. बीमा कंपनियों ने हर इलाके में एक मौसम केंद्र बनाया और उस मौसम केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार हर महीने की कम बारिश को आधार बना कर किसानों को बीमा का भुगतान किया जाना था. मौसम केंद्र निजी कंपनियों ने स्थापित किये थे और भुगतान भी उन्हें ही देना था. लेकिन बीमा कंपनियों ने अपने ही मौसम केंद्र की रिपोर्ट को भी आधार नहीं माना और बिना किसी आंकलन के मनमाने तरीके से किसानों को करोड़ों रुपये कम भुगतान किया गया.

सीएसडीएस-यूएनडीपी की इन्क्लूसिव मीडिया फेलोशिप के अध्ययन में यह बात सामने आई कि छत्तीसगढ़ के सभी 27 ज़िलों में निजी बीमा कंपनियों ने मनमाने तरीके से आंकलन करते हुये किसानों को करोड़ों रुपये की चपत लगाई. हालत ये हुई कि जिन किसानों ने खेती ही नहीं की, पटवारी रिकार्ड में जिन खेतों को सूखा के कारण फहल नहीं लगाने की बात दर्ज की गई, उन किसानों से भी बीमा कंपनी ने 20-20 हजार रुपये की प्रीमियम की रकम वसूल ली. इसके उलट राज्य के कई इलाकों में बीमा कंपनियों ने सूखा के नाम पर 5-5 रुपये का मुआवज़ा भी बांट दिया.

इस मौसम आधारित घोटाले में सबसे बड़ा हेर-फेर बारिश के आंकड़ों में किया गया. बीमा कंपनियों की खुलेआम लूट को इस बात से समझा जा सकता है कि इन बीमा कंपनियों ने जो मौसम केंद्र खुद स्थापित किये, उनके आंकड़ों को भी खारिज कर दिया और मनमाने तरीके से मुआवजे की रकम बांटने का काम किया. पूरे राज्य में बीमा कंपनियों ने लूट के इस खेल को अंजाम दिया.

इस खुली लूट का शिकार मुख्यमंत्री का गृह ज़िला राजनांदगांव भी हुआ. राजनांदगांव में करीब 1 लाख 22 हज़ार किसान हैं, जहां निजी बीमा कंपनी बजाज एलायंज ने 27 मौसम केंद्र स्थापित करने का दावा किया है. इन 27 मौसम केंद्रों में से 18 केंद्र ऐसे थे, जहां तयशुदा बारिश नहीं हुई थी. लेकिन बीमा कंपनी और सरकार के दस्तावेज़ों से यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि बीमा कंपनी ने सारखेड़ा और छाबरगांव नामक मौसम केंद्र को छोड़ कर शेष सभी 16 केंद्रों में किसानों से धोखाधड़ी की. राजनांदगांव में अगस्त में रेनफाल ट्रिगर 273 एमएम और सितंबर में 172 एमएम था.

इसे आम भाषा में समझा जाये तो इसका मतलब ये था कि 273 एमएम और 172 एमएम से अगर कम बारिश हुई तो प्रति एमएम कम बारिश के आधार पर किसानों को बीमा की रक़म का भुगतान किया जाना था, लेकिन बीमा कंपनी ने ऐसा नहीं किया और किसानों की करोड़ों रुपये की रक़म बीमा कंपनी दबा गई. केवल धान के ही आंकड़ों को देखें तो अकेले राजनांदगांव के 16 मौसम केंद्रों में किसानों को बीमा कंपनी ने 6,59,29,471.65 रुपये का कम भुगतान किया.

किसानों के साथ धान के अलावा काला चना, हरा चना, मक्का और सोयाबीन की फसलों की बीमा रकम में भी भ्रष्टाचार हुआ और इन फसलों में भी किसानों को 37,58,412.82 रुपये का कम भुगतान किया गया. लेकिन मामला अकेले राजनांदगांव ज़िले भर का नहीं है. पूरे राज्य में बीमा कंपनियों ने किसानों से लूट के लिये अलग-अलग तरीके अपनाये और किसानों को छला.

उदाहरण के लिये बिलासपुर ज़िले को लें. बिलासपुर के केड़ाडाड में जुलाई में तयशुदा 286 मिमी के मुकाबले 48.19 मिमी कम बारिश हुई, जिसके एवज में प्रति हेक्टेयर किसानों को 986.44 रुपये दिया जाना चाहिये था. बिजौरी मौसम केंद्र में जुलाई में 286 मिमी के बजाये 67.72 मिमी कम बारिश हुई, जिसके एवज में कंपनी को 1386.22 रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा देना था. इसी तरह अगस्त में 269 मिमी के बजाये 130.13 मिली कम बारिश हुई, जिसके एवज में किसानों को 2776.97 रुपये का मुआवजा मिलना था. मतलब ये कि बिजौरी मौसम केंद्र से संबद्ध गांवों के किसानों को प्रति हेक्टेयर 4163.19 रुपये का मुआवजा मिलना था. लेकिन बीमा कंपनी ने किसानों को ठेंगा दिखा दिया और मुआवजा बांटा ही नहीं.

(यूएनडीपी-सीएसडीएस की इन्क्लूसिव मीडिया फेलोशिप के तहत किये गये अध्ययन का हिस्सा)

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