कानन, रणांगन, मुक्तांगन

कनक तिवारी
सुकमा के पास चिंतागुफा क्षेत्र में अंगरेजी अंधविश्वासी तेरह तारीख को तेरह सुरक्षाकर्मियों की हत्या नक्सलियों ने की. बाद में एक और शहादत जुड़ गई. अब तो छत्तीसगढ़ को ही नक्सली वारदातों के कारण चिंतागुफा कहना चाहिए. केन्द्र और नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारें गाल बजाती दावा करती रहती हैं कि नक्सलियों को नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा. कई ठिकानों पर उनकी ताकत कम भी हुई है. फिर भी माओवादी हैं कि आचरण में ‘खाओवादी‘ और हरकतों में ‘मारोवादी‘ बने हुए हैं. यह क्यों है कि नक्सली वारदात और भूकम्प को लेकर कोई सही भविष्यवाणी नहीं हो सकती.

बिलासपुर के पास पेंडारी उपवन के पास सरकारी नसबन्दी शिविर में वंचित वर्ग की तेरह महिलाओं की सरकारी बदइंतजामी के कारण दुर्घटनाग्रस्त मौत होने के बाद उसमें पड़ोसी शिविर की एक मौत जुड़ने पर वहां भी संख्या चौदह हुई. ये मौतें सरकार द्वारा जहरीली दवाएं खरीदकर उन दुर्भाग्यशाली महिलाओं को स्वास्थ्य रक्षा के नाम पर खिलाई गईं.


बस्तर में राज्य सरकार के आमंत्रण पर दूसरे राज्यों के सिपाही छत्तीसगढ़ की रक्षा करने में मारे जाते रहते हैं. दोनों त्रासदियों के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार के बावजूद दुनिया के कई देशों का तूफानी दौरा करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ घंटों के लिए छत्तीसगढ़ नहीं आ सके. छत्तीसगढ़ की वंचित वर्ग की महिलाएं और अपनी कुर्बानी देते सुरक्षाकर्मियों की सुरक्षा पर प्रधानमंत्री मलहम नहीं लगा पाए. वे अलबत्ता झारखण्ड और जम्मू कश्मीर में चुनावी रैलियों को अपने सियासी भविष्य की सुरक्षा के लिए संबोधित करने में नहीं चूके. कांग्रेस के राजकुमार आए लेकिन यही लगा कि नहीं आए.

पेंडारी विभीषिका के बावजूद केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने भी आने की जहमत नहीं पाली. छत्तीसगढ़ भाजपा के वर्षों प्रभारी रहे नड्डा जब तब सियासी तफरीह के कारण आते रहे. केन्द्र शासन के जनसंख्या नियंत्रण अभियान में ही तो वंचित वर्गों की युवतियां जीते जी मार डाली गईं.

सुकमा प्रकरण में केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह रायपुर से ही लौट गए. वारदात स्थल तक पहुंचते तो सुरक्षा बलों के साथ जनता का मनोबल ऊंचा होता. निष्कर्ष तो यही निकला कि गृह मंत्री भी मौका-ए-वारदात तक जाने का संयोग नहीं जुटा सके. कारण कुछ भी हो. राज्य पुलिस द्वारा आमंत्रित सहकर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था की बार बार नाकामी साफ नज़र आती है. कड़ी घेराबंदी तो पेंडारी कांड में गिरफ्तार शल्य चिकित्सक डाक्टर गुप्ता की की गई थी कि पत्नी तक को मिलने के लिए पुलिस की चिरौरी करनी पड़ी.

राज्य पुलिस की खुफिया शाखा के नाकारापन पर विशेषज्ञ सवाल उठाते रहे हैं. अन्य राज्यों के सुरक्षाकर्मी परिस्थितियों का आकलन किए बिना खतरा उठाकर जाने से रोके क्यों नहीं जाते? वे बस्तर की भूगोल, भाषा, बोली, सड़कों, जंगलों, आदिवासियों, संस्कृति बल्कि पूरे माहौल से अपरिचित होते हैं. उनके साथ, आगे और पीछे स्थानीय पुलिस के अधिकारी कदमताल क्यों नहीं करते. पुलिस अधिकारियों को लगातार तरक्की और सुविधाएं मिल रही हैं. जवानों की मौत का आंकड़ा भी तरक्की पा रहा है. पिछले सुरक्षा सलाहकार और देश के शीर्ष पुलिस अधिकारी गिल को भी स्थानीय पुलिस की खुफियागिरी पर संदेह रहा है.
माओवादी सरकारी और निजी ठेकों में खुले आम चौथ वसूलते हैं. बस्तर में सरकारी ठेकों की दरें अन्य जिलों से अधिकृत तौर पर ज्यादा होती हैं. केन्द्र से माओवाद के सफाए के लिए पर्याप्त धन और साधन मिलते हैं. कई मदों का हिसाब अंकेक्षण नियमों के परे है.

सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत कई जानकारियां सुरक्षा संबंधी कारणों से नहीं दी जा सकतीं. केन्द्र की एक विशेषज्ञ समिति ने आठ वर्षों पूर्व कई सिफारिशें और सुझाव सरकार को दिए हैं. राज्यपाल संविधान की पांचवीं अनुसूची के अनुसार उचित आदेश नहीं देते. वे बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, लेखकों, जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की संयुक्त बैठक क्यों नहीं बुलाते. आदिवासी क्षेत्रों में पेसा और वन्य व्यवस्थापन के अधिनियमों को लेकर सरकार श्वेत पत्र प्रकाशित क्यों नहीं करती.

गरीब आदिवासियों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखने से नक्सली उनका मनोवैज्ञानिक शोषण करने से बाज़ क्यों आएंगे. नक्सलवाद नासूर है. नक्सलियों की वजह से कोई व्यक्ति जीवित रहने तक को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकता. बस्तर में नक्सल हत्याओं के बावजूद राष्ट्रीय स्तर का अस्पताल तक नहीं है. निजी अस्पतालों की करोड़ों की कमाई की सांठगांठ कब रोकी जाएगी. शहीद जवानों के वस्त्र, जूते एवं अवशेष कूड़े के ढेर पर लावारिस अवांछित वस्तुओं की तरह फेंक दिए गए. इलेक्ट्रानिक मीडिया ने वहां कुत्तों को भी दिखाया. जवान मर गए. स्वास्थ्य मंत्री अमर हैं.

पेंडारी त्रासदी और चिंतागुफा हत्याकाण्ड राज्य के जनसम्पर्क विभाग द्वारा पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित रायपुर साहित्य समारोह के मुंह में मक्षिका पातः की तरह आ गए. छत्तीसगढ़ बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और किसानों के संवेदनशील कारणों से तनावग्रस्त है. कई बुद्धिजीवी प्रश्न भी हैं. अकादमिक नस्ल के सवालों से जूझते रहने को साहित्यिक अनुष्ठान कहा जा सकता है. साहित्य मनुष्य की जीवन यात्रा का राजपथ नहीं जनपथ है. वह किनारे छूट गई पगडण्डी नहीं है. छत्तीसगढ़ में कबीर, घासीदास, विवेकानन्द, हबीब तनवीर, मुक्तिबोध, माधवराव सप्रे, सुन्दरलाल शर्मा, रामदयाल तिवारी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडे, लोचनप्रसाद पांडे, डा. बलदेवप्रसाद मिश्र, ठाकुर जगनमोहन सिंह, प्रमोद वर्मा, श्रीकांत वर्मा, शानी, सत्यदेव दुबे और सतीष चौबे वगैरह की वैचारिकता की तात्विक अनुगूंज है. साहित्य समारोह इनकी संवेदनशील यादों का माध्यम होगा.

कुछ अनिमंत्रित और अनुपस्थित साहित्यकार अनिवार्यतः मीडियॉकर नहीं होते. पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हो रहे साहित्य समारोह को इससे बेहतर आयोजित किया जा सकता था लेकिन ऐसे आरोप तो लगते ही रहते हैं. राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में अभिव्यक्ति की उत्कृष्टता को लेकर उम्मीद जागी थी लेकिन बाद में सब कुछ बहुत ज़्यादा स्थानीय हो गया. श्रीकांत वर्मा, हबीब तनवीर, शानी, सत्यदेव दुबे वगैरह कुछ नाम हैं जिनकी वैचारिकता के सहारे आयोजन के विषयों को रेखांकित कर उनकी स्मृति को समर्पित किया जा सकता था. पेंडारी मादासंहार और चिंतागुफा नरसंहार को लेकर राज्य कोई सर्वसम्मत जनभावना सवा दो करोड़ जनता के अनुमोदन से इतिहास की स्याही से लिख भी तो दे.

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