विज्ञान कथाएं और हकीकत…

सुनील कुमार
चौथाई सदी पहले एक साईंस फिक्शन फिल्म आई थी, जुरासिक पार्क. मशहूर फिल्म डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग की इस फिल्म ने दर्शकों को अपने डायनॉसॉर से हिलाकर रख दिया था. फिल्म की कहानी एक ऐसे खरबपति की थी जिसमें एक टापू पर वैज्ञानिकों की मदद से क्लोनिंग तकनीक से फिर डायनॉसॉर बना लिए थे, और वे जिंदा डायनॉसॉर पर्यटकों के लिए पेश भी किए गए थे. बाद में इस विषय पर बहुत सी और फिल्में बनी और खूब चलीं.

लोगों को सच्चे इतिहास के एक पन्ने को आगे बढ़ाकर उस पर भविष्य की कल्पनाओं को देखने में खूब मजा आता है. और जब ऐसी कल्पनाएं विज्ञान की असली संभावनाओं की बुनियाद पर खड़ी होती हैं, तो लोगों को अधिक हिलाकर रख देती हैं. क्लोनिंग की तकनीक एक हकीकत है, और डायनॉसॉर का इतिहास, या इतिहास में डायनॉसॉर भी हकीकत हैं. इन दोनों को मिलाकर जब एक विज्ञान कथा तैयार होती है, तो वह अधिक रोमांचक रहती है.


अब दो अलग-अलग खबरें हैं जिनको मिलाकर भी देखने की जरूरत है. दो दिन पहले विज्ञान की एक खबर आई कि साइबेरिया के बर्फ में करीब 42 हजार बरस पहले दब गए कुछ कृमि (राऊंडवाम्र्स) बर्फ पिघलने से एक बार फिर हरकत में आए, और उन्होंने तुरंत ही खाना तलाश करना शुरू कर दिया. वे धरती के हिमयुग के वक्त से बर्फ में दबे हुए थे, और उनके भीतर जिंदगी 42-45 हजार बरस बनी रही. वे हिले-डुले भी नहीं, न कुछ खाना मिला, और न ही वे मरे. लेकिन जैसे ही उनकी यह बर्फीली नींद पूरी हुई, वे खाना तलाश करते घू्मने-फिरने लगे, और तुरंत ही खाना भी शुरू कर दिया.

अब विज्ञान के हाथ इतने लंबे हो गए हैं कि वे बर्फ के इस टुकड़े पर ऐसे तीन सौ कृमियों की शिनाख्त कर चुके हैं जिनमें से दो मादा भी हैं, और ये जिंदगी में लौट रहे हैं, या ऐसा कहें कि इनमें जिंदगी लौट रही है. मास्को के इस वैज्ञानिक संस्थान ने यह तथ्य सामने रखा है कि कृमियों के अलावा कई किस्म के वैक्टीरिया भी ऐसी लंबी बर्फीली नींद में सोए हुए हैं जो कि ऐसे लंबे क्रायोप्रिजरवेशन के बाद फिर से सामान्य जिंदगी शुरू कर देते हैं.

यह मामला इंसान की जिंदगी में पहली मोहब्बत सा लगता है, जो कि पूरी जिंदगी सुला भी दी जाए, तो बाद में पहला मौका मिलते ही जागकर उठ बैठती है.

अब दूसरी खबर यह है बहुत से देशों के वैज्ञानिक धरती में इतना गहरा छेद करने की कोशिश कर रहे हैं कि वह दस किलोमीटर से अधिक की गहराई तक चले जाए, और उससे कई किस्म की वैज्ञानिक जांच हो सके. यह भी पता लग सके कि यह धरती बनी कैसे, उसके भीतर की सतह किस गहराई पर कैसी है, उसमें कौन-कौन सी चीजें हैं, और क्या भीतर इतनी गहराई में भी जिंदगी के कोई निशान हैं.

इसमें जापान की सरकार सबसे बड़ी मदद कर रही है, और इस रिसर्च की कामयाबी से ऐसी जानकारी मिलने की उम्मीद है जिससे कि भूकंप की बेहतर भविष्यवाणी की जा सके. जापान भूकंप से बहुत बार नुकसान झेल चुका देश है, और वह ज्वालामुखी और सुनामी भी झेल चुका है. इसलिए मौसम की मार के लिए भविष्यवाणी उसके लिए बहुत से और देशों के मुकाबले अधिक मायने रखती है.

अब अमरीका में बनी जुरासिक पार्क फिल्म के साथ रूस में 42 हजार बरस बाद जिंदगी में लौटे कृमि से होते हुए अगर जापान की धरती की खुदाई को एक साथ देखें, तो लगता है कि धरती की ऐसी गहराई से जाने कैसी जिंदगी या जाने कैसी चीजें निकलकर सामने आ सकती हैं जो कि लाखों बरस पहले की जिंदगी को सामने रखे, जिंदा कर दे, और आज की इस पीढ़ी की जिंदगी के मुकाबले उसे खड़ा कर दे.

धरती के लाखों बरस पहले के बाशिंदे आज जिंदा होकर सामने खड़े हो जाएं तो आज की जिंदगी उसके साथ कैसे जिएगी, उसके सामने कौन सी चुनौतियां आएंगी, और उनमें से कितनी चुनौतियों या खतरों की कल्पना करके आज का विज्ञान और आज का इंसान उसके मुकाबले तैयारी कर सकते हैं?

विज्ञान और सामाजिक सोच इन दोनों का आपस में गहरा रिश्ता कई बार नहीं भी हो पाता. लोगों को अगर सामाजिक सरोकार की फिक्र रहे, तो वे पता नहीं कौन से शोध कर सकें, कौन सी खोज कर सकें, और कौन सी तकनीक का इस्तेमाल कर सकें. सामाजिक खतरों की फिक्र करते हुए विज्ञान अपने आपको बर्फ के भीतर जिंदा दफन तो कर सकता है, लेकिन ऐसी फिक्र के साथ वह नई खोज और आविष्कार का काम नहीं कर सकता.

विज्ञान की नैतिकता बहस का एक बड़ा जटिल मुद्दा हमेशा से रहा है, और जब विज्ञान दसियों हजार या लाखों बरस पहले की जिंदगी के साथ तकनीक का एक खेल खेलता है, तो शायद वह अपनी उस पल की कामयाबी पर आत्ममुग्ध रहता है, और उससे परे उसे दुनिया के लंबे अरसे के भले और बुरे की फिक्र कुछ देर के लिए तो नहीं रह जाती.

एक तरफ तो धरती के सीने तक खुदाई करने का काम चल रहा है ताकि धरती को बेहतर समझा जा सके, लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि ऐसी खुदाई से सामने आने वाले तमाम खतरे क्या आज विज्ञान की कल्पना की सीमा के भीतर हैं? या कोई ऐसी अनहोनी भी हो सकती है जिससे कि निपटना आज के मौजूदा विज्ञान के लिए नामुमकिन होगा.

ऐसी अनगिनत विज्ञान कथाएं हैं जो कि विज्ञान की कोशिशों को तबाही का सामान बनाकर रख देती हैं. अब 42 हजार बरस पुराना कोई कृमि आकर धरती की जिंदगी पर कोई ऐसी दिक्कत खड़ी कर दे जिसका इलाज पिछली कुछ सदियों के विज्ञान ने जाना ही न हो, तो क्या होगा? और अगर धरती की इस तरह बेतहाशा गहरी खुदाई से धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति में कोई बड़ा बदलाव आ जाए, तो क्या होगा? ऐसी खुदाई से धरती के भीतर कोई ऐसा फेरबदल हो जाए जिससे भूकंप या ज्वालामुखी के कुछ नए बेकाबू नमूने सामने आ जाएं, तो क्या होगा?
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शाम के अखबार छत्तीसगढ़ के संपादक हैं.

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