अकेली पड़ गई हैं शर्मिला

रविशंकर रवि
इरोम शर्मिला की लड़ाई की तरकीब बदलते ही उसे इस्तेमाल करने वाले संगठन ही उसके सबके बड़े दुश्मन बन गए हैं. अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने के फैसले ने उन्हें अकेला कर दिया है.

पिछले सोलह वर्षों से सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाने की मांग पर आमरण अनशन करने वाली लौह महिला इरोम शर्मिला के अनशन तोड़ने और चुनावी प्रक्रिया में भाग लेकर अपने मकसद को पाने की घोषणा के बाद से ही उसके संघर्ष की आड़ में अपनी राजनीति करने वाले समूह ही उसके दुश्मन हो गए हैं.

जिस शर्मिला को मणिपुर में कथित सरकारी हिंसा के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक माना जाता है, अब उसी शर्मिला के खिलाफ सड़कों पर जुलूस निकाले जा रहे हैं, उसका रास्ता रोका जा रहा है और उसे रहने के लिए घर देने से मना कर दिया गया है. क्योंकि इरोम शर्मिला अब अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहती है.

शर्मिला अब अपनी लड़ाई का तरीका बदल रही है. उसने सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून के खिलाफ संघर्ष तो जारी रखा है, लेकिन लड़ाई का तरीका बदलना चाहती हैं. वह चुनाव लड़ना चाहती हैं. वह अपने प्रेमी से शादी करना चाहती है. शर्मिला को लगता है कि इतने दिनों तक आमरण अनशन करने के बाद उसकी आवाज देश की आवाज नहीं बन सकी. चंद समूह ही उसके समर्थन में आगे आए. जबकि उसने अपने संघर्ष के लिए गांधी के बताए रास्ते का अनुशरण किया था. इसलिए वह चुनावी प्रक्रिया में भाग लेकर संसदीय तरीके से सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाना चाहती है.

यह बात मणिपुर के उन संगठनों को नहीं पच रही है, जो शर्मिला के संघर्ष के नाम पर अपनी राजनीति कर रहे थे. शर्मिला को आगे करके कई संगठन अपनी दुकान चला रहे थे. कई भूमिगत संगठन भी इसमें शामिल हैं. शर्मिला की मां और रिश्तेदार भी विभिन्न कारणों से उसके फैसले का विरोध कर रहे हैं.

सबसे अधिक विरोध उसके गैर मणिपुरी से शादी करने के फैसले को लेकर है. एक संगठन ने तो उसकी हत्या की धमकी तक दे दी है. कुछ महिला संगठनों ने उसका रास्ता रोकने का प्रयास किया. हालांकि शर्मिला ने साफ कर दिया है कि जब तक सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून समाप्त नहीं हो जाता है, तब तक वह न तो अपने घर लौटेंगी और न ही अपनी मां से मिलेंगी.

मणिपुर में कई भूमिगत संगठन राज्य की तबाही की वजह बने हुए हैं. उनका मकसद सिर्फ धनउगाही है. मणिपुर में उग्रवादी गतिविधियों की वजह से आमलोग परेशान हैं. दूरदराज के इलाके में विकास नहीं हो पा रहा है. इन सारी स्थितियों ने भी शर्मिला को परेशान किया होगा. कुछ लोगों का कहना है कि राजनीति में गंदे लोग हैं.

राजनीति से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है, लेकिन शर्मिला का मानना है कि राजनीति में समाज से लोग आते हैं और यदि समाज गंदा है तो गंदे लोग राजनीति में आएंगे, इसलिए अच्छे लोगों को राजनीति में आना चाहिए.

शर्मिला के तमाम तर्कों के बावजूद आज की सच्चाई यह है कि वह अकेली हो गई हैं. वह अपनी आजादी चाहती हैं, लेकिन उनका समर्थन कर रहे स्थानीय लोग खुश नहीं हैं. इसलिए शर्मिला के सामने राह कठिन है.
* लेखक वरिष्ठ पत्रकार और गुवाहाटी से प्रकाशित दैनिक पूर्वोदय के संपादक हैं.

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