शिवनाथ की कब होगी मुक्ति?

रायपुर:  शिवनाथ नदी को रेडियस वाटर लिमिटेड को बेचे जाने के खिलाफ 2007 में विधानसभा में पेश की गई लोक लेखा समिति की रिपोर्ट अब तक धूल खा रही है. 

शिवनाथ नदी को रेडियस वाटर लिमिटेड को बेचे जाने के खिलाफ 2007 में विधानसभा में पेश की गई लोक लेखा समिति की रिपोर्ट अब तक धूल खा रही है. सरकार की मेहरबानी ऐसी है कि नदी को बेचने के अपराध के विधानसभा की लोक लेखा समिति ने लिये जिस जिम्मेवार अफसर गणेश शंकर मिश्रा समेत दूसरे लोगों के खिलाफ एक माह के भीतर आपराधिक मामला दर्ज करने की अनुशंसा की थी, वे अब रमन सरकार की नाक के बाल बने हुये हैं. कहा जाता है कि भाजपा के एक बड़े नेता और कुछ अफसरों के दबाव में राज्य सरकार गणेश शंकर मिश्रा समेत तमाम दोषियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है.


शिवनाथ नदी के 23 किलोमीटर हिस्से को रेडियस वाटर नामक निजी कंपनी को 22 सालों के लिये गिरवी रखने का समझौता तत्कालीन मध्यप्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर के प्रबंध संचालक गणेश शंकर मिश्रा ने 5 अक्टूबर 1998 को किया था. देश और दुनिया भर में नदी को बेचे जाने को लेकर हंगामा हुआ. भाजपा ने भी तत्कालीन दिग्विजय सिंह और बाद में अजीत जोगी की सरकार के खिलाफ खूब हंगामा किया.

सरकार ने मामले की जांच विधानसभा की लोक लेखा समिति से करवाने की घोषणा की. रमन सिंह की सरकार में लोक लेखा समिति ने 16 मार्च 2007 को जब विधानसभा में जांच रिपोर्ट पेश की तो उसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आये.

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि- “जल प्रदाय योजना की परिसम्पत्तियां निजी कंपनी को लीज़ पर मात्र एक रुपये के टोकन मूल्य पर सौंपा जाना तो समिति के मत में ऐसा सोचा समझा शासन को सउद्देश्य अलाभकारी स्थिति में ढकेलने का कुटिलतापूर्वक किया गया षड़यंत्र है, जिसका अन्य कोई उदाहरण प्रजातांत्रिक व्यवस्था में मिलना दुर्लभ ही होगा….दस्तावेजों से एक के बाद एक षडयंत्रपूर्वक किए गए आपराधिक कृत्य समिति के ध्यान में आये, जिसके पूर्वोदाहरण संभवतः केवल आपराधिक जगत में ही मिल सकते हैं. प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई शासकीय अधिकारी उद्योगपति के साथ इस प्रकार के षड़यंत्रों की रचना कर सकता है, यह समिती की कल्पना से बाहर की बात है.”

लोक लेखा समिति सिफारिश की थी कि रेडियस वाटर लिमिटेड के साथ मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड रायपुर (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम) के तत्कालीन प्रबंध संचालक गणेश शंकर मिश्रा द्वारा किये गये अनुबंध एवं लीज़-डीड को प्रतिवेदन सभा में प्रस्तुत करने के एक सप्ताह की अवधि में निरस्त करते हुए समस्त परिसम्पत्तियां एवं जल प्रदाय योजना का आधिपत्य छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकाल निगम द्वारा वापस ले लिया जाए.

सिफारिश में कहा गया था कि मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड एवं मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर के तत्कालीन प्रबंध संचालकों एवं मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक निगम लिमिटेड के मुख्य अभियंता के विरुद्ध षड़यंत्रपूर्वक शासन को हानि पहुँचाने, शासकीय सम्पत्तियों को अविधिमान्य रूप से दस्तावेजों की कूटरचना करते हुए एवं हेराफेरी करके निजी संस्था को सौंपे जाने के आरोप में प्रथम सूचना प्रतिवेदन कर उनके विरुद्ध अभियोजन की कार्यवाही संस्थापित की जाए और इस आपराधिक षडयंत्र में सहयोग करने और छलपूर्वक शासन को क्षति पहुँचाते हुए लाभ प्राप्त करने के आधार पर रेडियस वॉटर लिमिटेड के मुख्य पदाधिकारी के विरुद्ध भी अपराध दर्ज कराया जाए.

सिफारिश में कहा गया था कि मध्य प्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड, रायपुर एवं जल संसाधन विभाग के तत्कालीन अधिकारी जिनकी संलिप्तता इस सम्पूर्ण षडयंत्र में परिलक्षित हो, इस संबंध में भी विवेचना कर उनके विरुद्ध भी कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही एक माह की अवधि में आरंभ की जाए.

लोक लेख समिति ने यह भी कहा कि समिति द्वारा अनुशंसित सम्पूर्ण कार्यवाही सम्पादित करने की जिम्मेदारी सचिव स्तर के अधिकारी को सौंपते हुए शासन का हित रक्षण करने के लिए उत्कृष्ट विधिक सेवा प्राप्त करते हुए आवश्यकतानुसार न्यायालयीन प्रकियाओं में विधिक प्रतिरक्षण हेतु भी प्रयाप्त एवं समुचित कार्यवाही सुनिश्चित की जाए ताकि विधिक प्रतिरक्षण के अभाव में अथवा कमज़ोर विधिक प्रतिरक्षण के कारण शासन को अनावश्यक रूप से अलाभकारी स्थिति में न रहना पड़े.

विधानसभा की लोक लेखा समिति की इस रिपोर्ट पर कार्रवाई का आलम ये है कि अब तक यह अफसरों की मकड़जाल में उलझा हुआ है. अपने सहयोगी अफसरों को बचाने के इस दुर्लभतम मामले में फाइलों पर कुंडली मार कर बैठे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने का साहस कोई नहीं कर पा रहा है.

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