आत्महत्या में योगदान

कोलकाता | एजेंसी: आज के समय में एक दूसरे से जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया का चलन बहुत बढ़ गया है, खासतौर से युवाओं के बीच. लेकिन यही सोशल मीडिया इन युवाओं के लिए कहीं न कहीं खतरा बन कर उभर रहा है. एक मनोचिकित्सक का कहना है कि सोशल मीडिया, युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ाने में योगदान कर रहा है.

चेन्नई के आत्महत्या रोकथाम केंद्र ‘स्नेहा’ की संस्थापक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आत्महत्या निवारण और अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क की सदस्य लक्ष्मी विजयकुमार ने कहा कि जिंदगी में अच्छे दोस्तों की कमी और ऑनलाइन दोस्तों की अनदेखी, युवाओं में आत्महत्या का कारण बन रही है.

लाइफलाइन फाउंडेश द्वारा शुक्रवार को यहां आयोजित 16वें बीफ्रेंडर्स इंडिया सम्मेलन के मौके पर लक्ष्मी ने कहा, “युवा छद्म मित्र बना रहे हैं, असली जीवन के दोस्त नहीं. जब वे किसी से बात करना चाहते हैं, तो उनके सहयोग के लिए सच्चे दोस्त नहीं होते.”

उन्होंने कहा, “दूसरी बात, बहुत से युवा साइबर प्लेटफार्म पर अस्वीकृति को सही से संभाल नहीं पाते. साइबर धमकियां बढ़ चुकी हैं.. सोशल मीडिया इसके कारण के रूप में उभर रहा है.”

तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में श्रीलंका के दस प्रतिनिधियों के अलावा भारत के 13 बीफ्रेंडर्स इंडिया केंद्रों के 50 स्वयंसेवक और सहायक हिस्सा ले रहे हैं.

लक्ष्मी ने बताया, “यह संभवत: परिवार जैसे पारंपरिक सहयोग व्यवस्था में आई कमी के कारण है.”

डब्ल्यूएचओ के अनुमान के मुताबिक, हर साल लगभग दस लाख लोग आत्महत्या करते हैं, वैश्विक मृत्युदर में हर 100,000 में 16 लोगों की या हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति की मौत आत्महत्या से होती है.

पिछले 45 सालों में वैश्विक स्तर पर आत्महत्या की दर 60 प्रतिशत बढ़ी है.

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