राजनीति में धन की दखलअंदाजी

जेके कर
अमरीका में राजनीति में धन की दखलअंदाजी के खिलाफ़ प्रदर्शन हुआ. करीब 800 लोगों ने वाशिंगटन डीसी के कैपिटल हिल में प्रदर्शन करते हुये गिरफ्तारी दी. प्रदर्शनकारी ‘मनी आउट, पीपल इन’ का नारा लगा रहे थे. यह प्रदर्शन अभी जारी रहने वाला है. ‘डेमोक्रेसी स्प्रिंग’ नामक प्रदर्शन के आयोजक केनेथ मारटेल ने कहा, “अधिकांश अमरीकियों का मानना है कि जिस रफ्तार से चुनाव प्रचार में धन झोंके जा रहे हैं, उससे आम आदमी के मताधिकारों का हनन हो रहा है.”

जाहिर है कि इन कमजोर प्रदर्शनों से न तो राजनीति में धन की दखलअंदाजी रुकेगी और न ही कॉर्पोरेट घराने चुनाव के समय भारी चंदा देना बंद करेंगे. इतना जरूर है कि जिस देश में राजनीति तथा लॉबिंग पर दुनिया में सबसे ज्यादा धन खर्च किया जाता है वहीं से इसका विरोध शुरु हुआ है. वर्षो पहले एक राजनीतिज्ञ ने कहा था, “जहां पर अत्याचार है उसका विरोध वहीं से शुरु होता है.”


परन्तु यह सच है कि अमरीकी कॉर्पोरेट घराने वहां की नीति निर्धारण में धड़ल्ले से हस्तक्षेप करते हैं. कई बार तो अपने हितों के लिये अमरीकी सरकार को दुनिया पर अमरीकी प्रभुत्व कायम रखने के लिये नई नीतियां बनाने के लिये मजबूर कर देते हैं.

इसके लिये दो उदाहरण ही काफी हैं.

पहला, अमरीका की महाकाय दवा कंपनी फायजर तथा कृषि क्षेत्र की कंपनी मोनसांटो ने साल 1983 में वहां की सरकार को डंकल प्रस्ताव लाने के लिये बाध्य कर दिया. इससे पहले दो देशों के बीच समझौते द्विपक्षीय हुआ करते थे परन्तु ‘गैट’ मंच की स्थापना के बाद इसके माध्यम से पेटेंट तथा जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विसेस को बहुपक्षीय समझौते के तहत ला दिया गया. नतीजन दवाओं तथा बीजों पर एकाधिकार का वैश्विक कानून लागू कर दिया गया. भारत ने भी इस विश्व-व्यापार-संगठन याने डब्लूटीओ के चलते अपने यहां के पेटेंट कानून में बदलाव किये तथा विदेशी कंपनियों को बीमा जैसे क्षेत्र में आने की अनुमति देनी पड़ी.

दूसरा, अमरीकी तेल कंपनियों ने इराक में सद्दाम हुसैन द्वारा तेल के कुओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद वहां रासायनिक हथियार होने का हल्ला मचवाकर सेना से हमला करवा दिया गया. आज इराक के तेल के कुओं को अमरीका, फ्रांस तथा ब्रिटेन की कंपनियों ने आपस में बांट लिया है. वैसे एक चीज पर गौर करियेगा वह है जिस देश की जमीन के नीचे तेल है उस पर किसी न किसी कारण से अमरीकी सेना तैनात है.

अब एक नज़र अमरीकी चुनाव में हो रहे खर्च पर भी नज़र डाल ले तथा यह भी देख ले कि कॉर्पोरेट घराने किस तरह से वहां लॉबिंग के लिये धन देते हैं.

साल 2000 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में 1.41 अरब डॉलर का खर्च आया था तथा वहां के कांग्रेस के चुनाव में 1.66 अरब डॉलर का खर्च हुआ था. कुल 3.08 अरब डॉलर का खर्च आया था. जिसमें सरकार, राजनीतिक दल तथा उम्मीदवार के द्वारा किया गया खर्च शामिल है. इसी तरह से साल 2004 में राष्ट्रपति तथा कांग्रेस के चुनाव के लिये कुल 4.14 अरब डॉलर का, साल 2008 में 5.28 अरब डॉलर का तथा साल 2012 में 6.28 अरब डॉलर का खर्च किया गया था.

अमरीका में चुनाव के अलावा कांग्रेस के सदस्यों तथा सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारियों पर लॉबिंग के लिये साल 2000 में 1.57 बिलियन डॉलर, साल 2004 में 2.20 बिलियन डॉलर, साल 2008 में 3.31 बिलियन डॉलर तथा साल 2012 में भी इतना ही खर्च किया गया. याद रखिये यह खर्च कॉर्पोरेट घरानों के द्वारा किये गये हैं.

यदि साल 2015 में कुछ चुनिंदा घरानों द्वारा लॉबिंग पर किये गये खर्च को देखते हैं तो पता चलता है कि यूएस चेंबर ऑफ कॉमर्स ने 8.47 करोड़ डॉलर, बोइंग ने 2.19 करोड़ डॉलर, जनरल इलेक्ट्रिक्स ने 2.09 डॉलर तथा दवा उद्योग के संगठन पीएचफार्मा ने 1.89 करोड़ डॉलर खर्च किये थे. कोई जाहिल दिमाग व्यक्ति को भी आसानी से समझ में आ जायेगा कि इन खर्चो से कई गुना ज्यादा मुनाफा वसूला गया होगा.

अब इन भारी-भरकम कॉर्पोरेट घरानों पर कैपिटल हिल में प्रदर्शन कर रहे लोगों का कुछ असर पड़ेगा यह कहना मुमकिन नहीं है. परन्तु इससे अमरीकी लोकतंत्र में धनतंत्र के हस्तक्षेप की पोल तो खुल ही जाती है.

लगे हाथ भारत की चर्चा भी कर ली जाये तो गलत न होगा.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में 75 दिनों की चुनावी अवधि के दौरान भाजपा ने सबसे ज्यादा 715.48 करोड़ रुपये खर्च किये. भाजपा के बाद कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 486.21 करोड़ खर्च किये. इसके बाद एनसीपी ने 64.48 करोड़ और बीएसपी ने 30.06 करोड़ खर्च किये. राष्ट्रीय पार्टियों की ओर किया गया कुल खर्च 2014 के लोकसभा चुनावों में 49.43 प्रतिशत बढ़कर 1308.75 करोड़ हो गया, जबकि 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान यह आंकड़ा 875 करोड़ रुपये था. पिछले 10 साल के दौरान राष्ट्रीय पार्टियों का चुनावी खर्च 386 प्रतिशत बढ़ा है.

यह दिगर बात है कि कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 10 हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे. जाहिर है कि हमारे देश का लोकतंत्र भी शनै-शनै अमरीका का ही अनुसरण कर रहा है.

वैसे मीडिया का एक धड़ा यह आरोप लगाता है कि जिस उद्योगपति के विमानों में बैठकर साल 2013 से ही ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार किया गया था अब उस उद्योगपति पर ही सरकार सबसे ज्यादा मेहरबान है तथा उसके शेयरों के दाम जमकर बढ़े हैं.

अमरीका तथा हमारे देश के हालिया स्थिति से साफ है कि राजनीति करना, चुनाव लड़ना व उसके बाद देश की नीतियां तय करना आम जनता के हाथ में नहीं धन कुबेरों के मर्जी पर निर्भर करता है. जिसमें आम जनता को केवल वोट डालने का अधिकार प्राप्त है नीतिया तय करने का नहीं.

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