मोदी का वेलेंटाइन नहीं ?

कनक तिवारी
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जेन साकी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि मोदी के साथ अमेरिकी राजदूत नैन्सी पॉवेल की वेलेंटाइन दिवस के दिन मुलाकात का यह अर्थ नहीं है कि मोदी के अमेरिका प्रवेश की नीति में कोई बदलाव आया है. अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी का विसा 2005 में निरस्त कर दिया था. उसने इसका आधार धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघन के मुद्दे पर अमेरिकी कानून के प्रावधानों को बताया था.

9 साल बाद अचानक अमेरिकी राजदूत ने मोदी से मिलने का समय मांग लिया. इसे भाजपा ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मोदी की ताकत करार दिया. अमेरिका ने फकत यही कहा है कि वह भारतीय नेताओं से मिलने का सिलसिला जारी रखेगा.


पता नहीं मोदी अमेरिका जाने को इतने लालायित क्यों प्रचारित किए जाते हैं? पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस और फिल्म अभिनेता शाहरुख खान सहित कई भारतीयों का सुरक्षा जांच के नाम पर अमेरिका सरेआम अपमान कर चुका है. उसने भारतीय छात्रों के पैरों में बेड़ियां तक डाली हैं. मनमोहन सिंह सरकार ने समर्पण करते हुए परमाणु करार संधि की है. अमेरिका के साथ थोक तथा खुदरा व्यापार में अपमानजनक करार भी हुए हैं.

भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ हुए व्यवहार को लेकर पहली बार भारत ने कुछ कड़ाई का रुख दिखाया. इसके बावजूद अमेरिका ने पुलिसिया कार्यवाही जारी रखी है. मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाले वीरोचित संघ कार्यकर्ता उनकी तुलना समान नाम होने से स्वामी विवेकानन्द (पूर्व नाम नरेन्द्र) से करते हैं.

नरेन्द्र मोदी यदि अमेरिका के बारे में विवेकानन्द को पढ़ लें तो अमेरिका जाना भूल जाएंगे. मोदी गुजरात में सरदार पटेल की विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति लगाने के पीछे पड़े हैं. उन्हें गुजरात के ही तथा सरदार पटेल के गुरु महात्मा गांधी से कुछ लेना देना नहीं है.

भारतीय आज़ादी के लिए अमेरिकी प्रेसिडेंट रूज़वेल्ट ने मध्यस्थता करने के लिए गांधी से पेशकश की थी और गांधी को अमेरिका आने का निमंत्रण भी दिया था. बापू ने साफ मना कर दिया. यही कहा कि भारत अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए स्वयं समर्थ है. मोदी गुजरात के विकास को लेकर सबको चुनौती देते हैं कि वैसा विकास करने के लिए 56 इंच का सीना चाहिए. मोदी अपनी वही छाती अमेरिका नहीं जाने का ऐलान करके क्यों नहीं फुलाते? वे क्यों नहीं कहते कि अमेरिका यदि उन्हें निमंत्रण भी देगा तब भी वे वहां नहीं जाएंगे.

पता नहीं वह कौन सा रहस्य है जो भारतीय नेताओं को अमेरिका जाने के नाम पर उनके आत्मसम्मान तक पर चोट पहुंचाता रहता है! अपना इलाज कराने के लिए उद्योगपति, नेता, नौकरशाह और फिल्मी कलाकार अमेरिका जाते रहते हैं. यहां तक तो समझ में आता है. लेकिन राजनीति कोई कैंसर की बीमारी नहीं है और अमेरिका कोई काबिल डॉक्टर भी नहीं है.
* उसने कहा है-13

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