धान के कटोरे से पलायन क्यों?

रायपुर | जेके कर: मलेशिया में बंधक बनाये गये छत्तीसगढ़ के 22 मजदूर सकुशल सोमवार को लौट आये हैं. इनमें से 17 जांजगीर-चांपा जिले से हैं. छत्तीसगढ़ से मजदूर पलायन करके अन्य राज्यों में जाते रहें हैं, उनमें से कई बंधुवा भी बनाये गये हैं, अब विदेश में छत्तीसगढ़ी मजदूरों को बंधक बनाने का मामला सामने आया है. जाहिर है कि यदि मजदूर रोजगार के लिये पलायन नहीं करते तो बंधक बनाने की घटना ही नहीं घटती. इसके लिये शासन व प्रशासन को दोष मढ़ा जा सकता है. प्रधानमंत्री मोदी पर गरियाया भी जा सकता है. हम इसके उलट उन कारणों को जाने का प्रयास करेंगे जिसके कारण छत्तीसगढ़ के मजदूर पलायन करते हैं. सीजीखबर की एक पड़ताल-

छत्तीसगढ़ से पलायन होता है:
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह से 9 अगस्त 2015 को भारतीय मजदूर संघ की रायपुर बैठक में स्वीकार किया कि, ” राज्य निर्माण के समय जहां छत्तीसगढ़ से लगभग पांच लाख मजदूर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में जाते थे, अब केवल दस-बारह हजार लोग ही जाते हैं.”

मार्च 2015 में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के सवाल के जवाब में राजस्व विभाग के मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने बताया, ” वर्ष 2012 से 2015 तक 95924 लोगों ने राज्य से पलायन किया है.” उन्होंने बताया कि वर्ष 2012-13 में 22149 मजदूरों ने, वर्ष 2013-14 में 27830 मजदूरों ने और वर्ष 2014-15 में 45945 मजदूरों ने छत्तीसगढ़ से दूसरे राज्यों में पलायन किया है. मंत्री ने बताया कि वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के मध्य राज्य के जांजगीर चांपा जिले से 29190 मजदूरों ने, बलौदाबाजार जिले से 23005 मजदूरों ने, महासमुंद जिले से 16378 मजदूरों ने, बेमेतरा जिले से 10180 मजदूरों ने, राजनांदगांव जिले से 9419 मजदूरों ने, मुंगेली जिले से 6346 मजदूरों ने, रायगढ जिले से 625 मजदूरों ने, बिलासपुर जिले से 456 मजदूरों ने, बालोद जिले से 145 मजदूरों ने, जशपुर जिले से 118 मजदूरों ने तथा कोरबा जिले से 62 मजदूरों ने पलायन किया है.

पलायन का कारण:
छत्तीसगढ़ से मजदूरों के पलायन के सवाल पर कृषि मामलों के जानकार तथा जांजगीर-चांपा जिले में किसानों के बीच लंबे समय से काम कर रहे नंदकुमार कश्यप ने बताया,” बांगों नहर आने के पहले तक शक्ति तथा जांजगीर से दशकों से रोजगार की तलाश में पलायन होता आया है. पहले शक्ति तहसील में ज्यादातर सूखा पड़ता था इस कारण से किसानी का काम करने वाले दिगर राज्यों में काम की तलाश में चले जाते थे. वह परंपरा अब भी जारी है.” इसके अलावा उन्होंने कहा कि, ” छत्तीसगढ़ में प्रति क्विंटल धान का किसान को 1420 रुपये मिलता है इस कारण वह दिन में सौ-सवा सौ रुपयों से ज्यादा की मजदूरी नहीं दे सकता. जबकि केरल तथा अन्य राज्यों में यहां से ज्यादा रोजी दी जाती है.”

नंदकुमार कश्यप ने बताया कि केरल जैसे राज्यों में धान की फसल भी ज्यादा होती है तथा वे मसाले आदि का भी उत्पादन करते हैं. इस कारण से उनके पास देने के लिये ज्यादा मजदूरी होती है. यही लालच छत्तीसगढ़ के मजदूरों को पलायन के लिये प्ररित करता है.

उन्होंने बताया कि ज्यादा रोजगार की तलाश में मजदूर दिगर राज्यों में गये मजदूरों में से कई बंधक बना लिये जाते हैं. बंधक बना लिये जाने के कुछ कारणों को समझाते हुये उन्होंने कहा कि दरअसल में गांव के मजदूरों को दलाल दूसरे राज्यों में टिकट कटवाकर ले जाते हैं. इसके लिये वे पहले से ही दिगर राज्यों के उऩ लोगों से एडवांस में रुपये ले लेते हैं. उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ के मजदूरों को दूसरे राज्यों में 300-400 रुपये की रोजी के नाम पर ले जाया जाता है. दलाल मालिकों से पहले ही सात-दस दिन की रोजी एडवांस में ले लेते हैं. इस तरह से एक मजदूर के सात दिन की रोजी 2100-2800 रुपये तक दलाल डकार जाते हैं. उनका काम केवल मजदूरों को उनके काम के स्थल तक पहुंचाना होता है. इसके बाद दलाल अपना मुनाफा पीटकर वापस चले आते हैं.

जब मजदूरी देने की बात आती है तो मालिक दलाल को दिये एडवांस की रकम को काटने लगता है जिसके फलस्वरूप मजदूरों को बताये गये रकम के अनुसार रोजी नहीं मिल पाती है. यहां तक कि कई हफ्तों की रोजी एडवांस से एडजस्ट कर ली जाती है. उधर, मजदूर रोजी या मजदूरी न मिलने के कारण मजदूर वहां बंधक बन जाता है.

छत्तीसगढ़ के कृषि मामलों के जानकार कश्यप ने आगे बताया कि गांव में मजदूर अकेला काम की तलाश करता है या काम करता है. जबकि उसके घर के बाकी लोग मजदूरी करने नहीं जाते हैं. इसके पीछे सामाजिक कारण हैं. जब बात दिगर राज्यों में जाकर काम करने की आती है तो पूरा परिवार चले जाता है जिसके फलस्वरूप एक के स्थान पर चार लोग कमाने में लग जाते हैं.

पलायन पर सवाल पूछने पर छत्तीसगढ़ किसान सभा के पूर्व अध्यक्ष संजय पराते ने कहा कि पलायन तो बस्तर के खाते-पीते लोग भी करके रायपुर तथा अन्य स्थानों में आ रहें हैं. उन्हें बस्तर का माहौल असुरक्षित लगता है. संजय पराते ने कहा, ” अर्थात् कोई भी आदमी पलायन तभी करता है जब उसे अपने निवास स्थान में सुरक्षा तथा रोजगार नहीं मिल पाता है.” उन्होंने कहा यदि गांव वालों को अपने गांव में ही रोजगार के ऐसे अवसर मिले जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण हो सके तो वह काहे को पलायन करेगा. मामला नौकरी का है जैसे छत्तीसगढ़ के कई युवा आज पूना, मुंबई, बंगलुरु यहां तक कि विदेशों में भी नौकरी कर रहें हैं तथा ज्यादा कमा रहें हैं.

पलायन का अर्थशास्त्र:
संजय पराते ने छत्तीसगढ़ की स्थिति समझाते हुये कहा कि ताजा आकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू आय 64,442 रुपये है जबकि दिल्ली की 2,40,849 रुपये हरियाणा की 1,47,076 रुपये, महाराष्ट्र की 1,29,235 रुपये, तमिलनाडु की 1,28,366 रुपये, पंजाब की 99,578 रुपये, कर्नाटक की 1,01,594 रुपये, आंध्रप्रदेश की 90,517 रुपये तथा राजस्थान की 72,156 रुपये है. जाहिर सी बात है कि लोग ज्यादा पैसे की ललक में जो उनकी जरूरत भी है दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर जाते हैं.

छत्तीसगढ़ में कम होते रोजगार के अवसर:
इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में रोजगार के अवसर भी घट रहें हैं जिससे रोजगार की तलाश में पलायन जारी है. गौरतलब है कि संसद में पेश किये गये आकड़ों के अनुसार वर्ष उत्पादन क्षेत्र में वर्ष 2009-10 में प्रति हजार में 59 रोजगार के अवसर दिये वहीं 2010-11 में इसकी संख्या घटकर 48 रह गई.

राष्ट्रीय स्तर पर 2009-10 में उत्पादन क्षेत्र में प्रति हजार में 110 रोजगार मिले जो 2010-11 में बढ़कर 126 का हो गया था. जाहिर है कि छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्तर के विपरीत उत्पादन क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हो रहें हैं. गौरतलब है कि इस बात की जानकारी वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में दी.

छत्तीसगढ़ की तुलना यदि साथ में अस्तित्व में आये राज्यों के साथ की जाये तो राज्सभा में पेश किये गये यही आकड़े बयां करते हैं कि झारखंड में 2009-10 तथा 2010-11 में 77 रोजगार मिले थे तथा उत्तराखंड में 2009-10 तथा 2010-11 में क्रमशः 66 तथा 93 रोजगार मिले थे. छत्तीसगढ़ के लिये यही आकड़ा चौंकाने वाला है जिसमें 1009-10 की तुलना में 2010-11 में रोजगार कम मिले थे जबकि झारखंड में रोजगार देने की संख्या स्थिर रही थी तथा उत्तराखंड में इसमें वृद्धि दर्ज की गई थी. यहां तक की जिस मध्य प्रदेश का वर्ष 2000 तक छत्तीसगढ़ हिस्सा रहा है वहां भी 2009-10 में 61 रोजगार दिये गये जो 2010-11 में बढ़कर 72 का हो गया.

वहीं, केन्द्र सरकार के आकड़ों के अनुसार साल 2013-14 में 27 लाख 48 हजार 728 परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार की मांग की थी जिनमें से 25 लाख 12 हजार 379 परिवारों को रोजगार दिया जा सका था. साल 2013-14 में 100 दिनों का रोजगार 3 लाख 46 हजार 292 परिवारों को दिया गया था.

कृषि की भूमि उद्योगों को:
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के रहने वाले कृषि विशेषज्ञ तथा सामजसेवी आनंद मिश्रा ने कहा कि छत्तीसगढ़ के किसानों की भूमि उद्योगों को बांट दी जा रही है तथा उन उद्योगों में उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा है. उन्होंने कहा, जनवरी 2013 से जनवरी 2015 के बीच रायगढ़ जिले के 447.16 हेक्टेर भूमि को उद्योगों के लिये तथा 3481.89 हेक्टेयर भूमि खनन के लिये अर्जित किये गये थे.

-12 जनवरी 2015 को केएसके पावर प्लांट द्वारा जांजगीर-चांपा में दो आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करने का मामला सामने आया है.

-रायगढ़ जिले में 2010-11 से फरवरी 2015 के बीच 4 आदिवासी कृषकों की 4.9 हेक्टेयर जमीन गैर आदिवासी ने खरीद ली गई तथा 18 आदिवासी कृषकों की 25.2 हेक्टेर जमीन दिगर राज्यों के आदिवासियों के द्वारा खरीद ली गई.

-इसी दरम्यान रायगढ़ के घड़घोड़ा अनुभाग में जिंदल, सारडा एनर्जी, निको जायसवाल, गोवा इंडस्ट्रीयल तथा एसईसीएल द्वारा 404 किसानों के 625.19 हेक्टेयर भूमि खनन हेतु ली गई. इन सरकारी सूचनाओं के आधार पर समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कृषि की भूमि पर खनन तथा अन्य उदयोग लगाया जा रहा है.

तमाम उपलब्ध आकड़ों की पड़ताल तथा कुछ जानकारों से सवाल-जवाब करके मोटे तौर पर यह समझा जा सकता है कि पेट की आग छत्तीसगढ़ के मजदूरों तथा किसानी का काम करने वाले ग्रामीणों को दिगर राज्यों में पलायन करने के लिये मजबूर कर रही है. यदि इसे रोकना है तो छत्तीसगढ़ को छत्तीसगढ़ियाओं का भरण-पोषण करने लायक बानान होगा. घान के कटोरे में यदि पूरे परिवार को भरपेट खाना न मिले तो इससे दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है?

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