काले धन का राज खुलेगा?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: देश के सामने यक्ष प्रश्न यह है कि क्या काले धन का राज खुल पायेगा? देश के सर्वोच्य न्याय की संस्था, सर्वोच्य न्यायालय ने केन्द्र सरकार को मंगलवार को आदेश दिया है कि विदेशी बैंकों के सभी खातेदारों, चाहे वैध हों या अवैध सभी के नाम बुधवार को सीलबंद लिफाफे में पेश किया जाये. लिफाफा खुलने से पहले ही उसके अंदर नौजूद नामों को लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तथा उद्योग मंडलों में कयासों का दौर जारी है. इन सबसे देश की जनता काफी खुश है कि विदेशों में जमा काला धन देश के विकास के लिये उपयोग में लाया जायेगा.

हालांकि, सर्वोच्य न्यायालय में विदेशी बैंकों के खातेदारों का नाम सीलबंद लिफाफे में पेश किये जाने के बावजूद उनका सार्वजनिक होना तय माना जा रहा है. राजनीतिक पार्टियां जहां इसमें अपना नफा-नुकसान का आकलन कर पैंतरेबाजी करने से बाज नहीं आयेगी वहीं, देश के सवा अरब बाशिंदें उन नामों को जानने के लिये उतावले हैं कि किनका पैसा विदेशीं बैंकों की तिजोरी में भरा पड़ा है. बेशक, निकट भविष्य में काले धन का राज खुलने जा रहा है परन्तु इस यक्ष प्रश्न के बाद भी लाख टके का सवाल है कि क्या इन काले धनों को देश में वापस लाया जा सकेगा?


सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार को विदेशी बैंकों में खाता रखने वाले यहां के लोगों के नाम एक सीलबंद लिफाफे में अदालत को बुधवार तक उपलब्ध कराने का निर्देश दिया. खाते वैध हों या अवैध. सरकार द्वारा सात लोगों तथा एक कंपनी के नाम अदालत को उपलब्ध कराए जाने के एक दिन बाद सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश सामने आया है. आरोप है कि इन लोगों के विदेशी बैंकों में खाते हैं, जिनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जा चुकी है.

सर्वोच्य न्यायालय का कड़ा रुख
प्रधान न्यायाधीश एच.एल.दत्तू की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने महान्यायवादी मुकुल रोहतगी से कहा कि सरकार को कुछ बोलने की जरूरत नहीं है. उसे अदालत को नामों का खुलासा करना चाहिए. अदालत यह तय करेगी कि मामले की जांच आयकर अधिकारी करेंगे या केंद्रीय जांच ब्यूरो.

अदालत ने कहा, “पहले आप नाम दीजिए, उनकी जांच हम करवाएंगे. केवल एक, दो या तीन नहीं, बल्कि फ्रांस, जर्मनी तथा स्विटजरलैंड सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए सभी नामों को एक सीलबंद लिफाफे में अदालत को उपलब्ध कराएं.”

रोहतगी ने कहा कि खातों की सच्चाई की जांच आयकर अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है, जिस पर न्यायमूर्ति दत्तू ने कहा, “आप जांच की तकलीफ क्यों उठाना चाहते हैं? आप हमें नाम उपलब्ध कराइए. हम सीबीआई या आयकर को एक महीने में जांच पूरी करने का निर्देश देंगे.”

वित्तमंत्री की प्रतिक्रिया
अदालत के निर्देश के तुरंत बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने जिन नामों की मांग की है, उन्हें शीर्ष अदालत के ही कहने पर विशेष जांच दल को पहले ही सौंपा जा चुका है.

जेटली ने संवाददाताओं से कहा, “चूंकि वे नाम एसआईटी को पहले ही उपलब्ध कराया जा चुके हैं, इसलिए उसे अदालत को उपलब्ध कराने में कोई परेशानी नहीं होगी. समस्त सूची को बुधवार सुबह अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाएगा.”

कितने नाम
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, एक सूची में लगभग 700 लोगों के नाम हैं, जिसे फ्रांस के अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराया गया है. उसी प्रकार 2010 में जर्मनी ने कुछ भारतीय खाताधारियों के नाम सौंपे थे, जिनके लिचटेंस्टाइंस एलजीटी बैंक में खाते हैं. भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पहले नेता विपक्ष के पद पर रहते कहा था किअवैध विदेशी खाता वाले 782 भारतीयों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं. मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार यह आकड़ा 628 का है जिसमें से 3 नाम सोमवार को सर्वोच्य न्यायालय को सूचित किये जा चुके हैं.

कितना काला धन

पूर्व उपप्रधानमंत्री और पूर्व गृहमंत्री तथा भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण अडवाणी ने 2011 में विपक्ष के नेता रहते हुए एक आंकड़ा 28 लाख करोड़ रुपये का दिया था. उन्होंने कहा था कि यह आंकड़ा उन्होंने ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी के एक अध्ययन से लिया है. यह वाशिंगटन की एक गैर लाभकारी संस्था है, जो अवैध वित्तीय प्रवाह पर शोध और बहस चलाती है.

आडवाणी की अपनी ही पार्टी ने एक अनुमान 500 अरब डॉलर से 1,400 अरब डॉलर का दिया था. 2012 में केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश श्वेतपत्र में कहा गया था कि भारतीयों का स्विस बैंक में कुल 2.1 अरब डॉलर जमा है.

यहां तक कि एक रिपोर्ट में स्विस बैंकिंग एसोसिएशन की 2006 में जारी एक कथित रिपोर्ट के हवाले से कहा गया कि भारतीयों का 1,460 अरब डॉलर काला धन विदेशों में जमा है. बाद में स्विस बैंक के अधिकारियों ने हालांकि कहा कि बैंक ने कभी ऐसी कोई रिपोर्ट जारी नहीं की है.

ताजा-तरीन ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी की मई 2014 की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “अवैध धन का देश से बाहर जाना भारत की एक गंभीर समस्या है. जीएफआई शोध के मुताबिक 2002 से 2011 के बीच भारत ने अवैध धन के देश से बाहर जाने के कारण 343.9 अरब डॉलर खोया है. साथ ही भारत अवैध धन के देश से बाहर जाने के मामले में तैयार की गई एक सूची में पांचवें स्थान पर है और सर्वाधिक प्रति व्यक्ति जीडीपी वाले शीर्ष 10 देशों में सबसे गरीब है.”

आगे क्या होगा?
सर्वोच्य न्यायालय ने केन्द्र सरकार से मंगलवार को कहा है कि सभी खाते, वैध या अवैध की सूचना पेश की जाये. जाहिर है कि विदेशी बैंकों में पैसा होना कोई गुनाह नहीं है. गुनाह है यदि वैध तरीके से कमाये गये धन पर टैक्स न दिया गया हो या गलत कामों जैसे तस्करी, ड्रग या घूस के रूप में धन लिया गया हो. अवैध तरीकों से कमाये गये धन पर भारत सरकार अपने देश के कानून के अनुसार कार्यवाही करेगी.

दूसरी तरफ, भारत का करीब 85 देशों के साथ दोहरा कराधान पर समझौता है. जिसके मूल में यह है कि आय पर किसी एक देश में कर देने से दूसरे देश में वहीं आयकर फिर से न देना पड़े. आयकर कानून 1961 के धारा 90 तथा 91 के तहत इसका वर्णन इस प्रकार से किया गया है कि जिन देशों के साथ दोहरा कराधान पर समझौता है वहां कर देने से भारत में दुबारा कर नहीं देना पड़ेगा. वहीं, आयकर कानून 1961 की धारा 91 के अनुसार जिन देशों के साथ भारत का दोहरा कराधान का समझौता नहीं है, यदि वहां भी कर दिया गया है तो उसे छूट की पात्रता होगी.

अब आपकों स्पष्ट होने लगा होगा कि केवल विदेशी बैंकों के खातेदारों का नाम तथा उनका धन सार्वजनिक करना भर पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिये सरकारी एजेंसियों के माध्यम से जांच कर पता लगाना पड़ेगा कि क्या फलां-फलां का विदेशों में जमा धन जप्त किया जा सकता है या नहीं.

सबसे महत्वपूर्ण है कि बुधवार को तथा उसके बाद सर्वोच्य न्यायालय इस काले धन के मुद्दे पर कौन सा रुख अख्तियार करती है?

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