उत्तराखंड में जीत की खुशी कब तक?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: उत्तराखंड विधानसभा में हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस के जीत की खुशी कब तक रहेगी? क्या इससे देश की राजनीति करवट लेगी या महज यह जीत उत्तराखंड तक ही सीमित रह जाने वाली है? कांग्रेसी खुशी के मारे कह सकते हैं कि अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा उत्तराखंड से आगे न बढ़ सका. इसमें कुछ हद तक सच्चाई तो है परन्तु देश-दुनिया में तेजी से बदलते राजनीतिक हालात को देखते हुये तुरंत इस नतीजे पर पहुंचना अभी जल्दबाजी ही होगी.

अभी हरीश रावत को सीबीआई के उन सवालों का जवाब देना है जिसमें उन पर बागी कांग्रेसी विधायकों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में करने की कोशिश करते दिखाया गया है. केवल विधानसभा में बहुमत साबित करने से ही उत्तराखंड समस्या का हल नहीं निकल आयेगा. इस बार कांग्रेस के बागी विधायकों को मतदान में भाग लेने से रोकने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को आधार मानकर मतदान कराया गया था. बेशक कांग्रेस ने आतिशी जीत हासिल की है परन्तु छः माह बाद भी यदि कांग्रेस के विधायकों का बागीपन बरकरार रहता है तो हरीश रावत के लिये सरकार चलाना कठिन हो सकता है.

राजनीति के किसी नौसिखिये को भी यह साफ दिख रहा है कि कांग्रेस के लिये उत्तराखंड में अपने सभी विधायकों को एक करने की चुनौती सामने खड़ी है. बेशक अभी हरीश रावत को 28 के मुकाबले 33 मत मिले हैं यदि बागियों के 9 मत भाजपा के साथ हो जाये तो संख्या हो जायेगी 37 जो हरीश रावत के लिये परेशानी का सबब बन सकती है. उस हालात में फिर से हरीश रावत की सरकार अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा रोकने की हालत में नहीं होगी. कांग्रेस को फौरी जीत के बाद अपने आप को लंबी लड़ाई के लिये तैयार करना होगा.

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड विधानसभा में मंगलवार को हुए शक्ति परीक्षण में अपदस्थ मुख्यमंत्री हरीश रावत की जीत के एक दिन बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा लिया, जिसके साथ ही प्रदेश में कांग्रेस सरकार की वापसी का रास्ता साफ हो गया.

केंद्र सरकार ने बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया है, क्योंकि उत्तराखंड के अपदस्थ मुख्यमंत्री हरीश रावत ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया है और उनकी सरकार बहाल की जाएगी. हरीश रावत के पक्ष में 33, जबकि विपक्ष में 28 मत पड़े थे.

महान्यायवादी मुकुल रोहतगी ने न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा तथा न्यायमूर्ति शिव कीर्ति सिंह से कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि राज्य में सरकार के संचालन के लिए हरीश रावत के पास बहुमत है.

रोहतगी ने कहा, “उन्होंने शक्ति परीक्षण के दौरान अपना बहुमत साबित कर दिया है.”

न्यायालय ने केंद्र सरकार से प्रदेश से राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए कहा, ताकि हरीश रावत मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता में वापसी कर सकें.

रावत की जीत की पुष्टि मंगलवार को ही हो गई थी, लेकिन इसकी आधिकारिक घोषणा बुधवार को की गई.

दिल्ली में कांग्रेस ने कहा कि यह ‘लोकतंत्र की जीत’ है.

राहुल गांधी ने ट्वीट किया, “उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी की हार से सबक लेंगे और देश की जनता तथा हमारे पुरोधाओं द्वारा निर्मित लोकतंत्र नामक संस्था की हत्या बर्दाश्त नहीं करेंगे.”

हरीश रावत ने हालांकि कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार से उनकी कोई कटुता नहीं है और राज्य के विकास के लिए उसके सहयोग की जरूरत है.

रावत ने देहरादून में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, “यह बेहद तनाव भरा पल रहा है. यह अनिश्चितता का पल रहा है और राज्य को इससे नुकसान हुआ है. लेकिन अंत भला तो सब भला.”

कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने देहरादून में जमकर खुशियां मनाईं. पार्टी मुख्यालय राजीव भवन के निकट नाचते-गाते हुए उन्होंने एक-दूसरे को मिठाइयां बांटीं.

वहीं, हार से झुझलाई भाजपा ने दावा किया कि कांग्रेस की यह खुशी ज्यादा दिनों की नहीं है.

भाजपा नेता श्रीकांत शर्मा ने संसद के बाहर कहा, “यह बहुमत दिखावे के लिए है. यह अल्पकालिक विजय है. वे उत्तराखंड के लोगों का विश्वास पहले ही हार चुके हैं. सदन में कांग्रेस का बहुमत निर्वाचित सदस्यों की खरीद-फरोख्त का परिणाम है.”

कांग्रेस सरकार की वापसी के लिए हालांकि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की घोषणा का इंतजार किया जा रहा है.

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सदन में शक्ति परीक्षण के फैसले के बाद 45 दिनों से अधिक समय से चल रही रावत की कानूनी लड़ाई का अंत हो गया था.

प्रदेश में कांग्रेस के लिए समस्या की शुरुआत तब हुई, जब विजय बहुगुणा के नेतृत्व वाले बागी कांग्रेसी विधायकों को भाजपा ने अपनी तरफ करने का प्रयास शुरू किया. वे मुख्यमंत्री हरीश रावत को हटाने की मांग कर रहे थे.

समस्या ने 18 मार्च को तब विकराल रूप ग्रहण कर लिया, जब विधानसभा ने ध्वनिमत से एक बजट विनियोग विधेयक को पारित किया, जिसके बाद विपक्ष तथा कांग्रेस के बागी नौ विधायकों ने 70 सदस्यीय विधानसभा में मत विभाजन की मांग की.

रावत की समस्याएं हालांकि अभी यहीं खत्म नहीं हुई हैं. उन्हें बागी कांग्रेसी विधायकों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में करने के प्रयास से संबंधित एक वीडियो को लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो ने सम्मन जारी किया है.

हरीश रावत ने हालांकि आरोपों का खंडन किया है.(एजेंसी इनपुट के साथ)

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