युवाओं के बंद रास्ते

सुभाष गाताडे
आइआइटी कानपुर फिर सुर्खियों में है, पर कुछ गलत कारणों से. फरवरी के पहले हफ्ते में बीटेक के तृतीय वर्ष का छात्र मंजुनाथ अपने कमरे में पंखे से लटका मिला. इससे पहले जनवरी में बीटेक के ही छात्र गोपाराप्पू साईकुमार रेड्डी ने चलती ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी थी. पिछले साल आइआइटी काउंसिल की मीटिंग में सभी आइआइटी ने इस मसले पर अतिरिक्त ध्यान देने की बात की थी और एक टास्क फोर्स की रिपोर्ट को स्वीकारा था.

टास्क फोर्स का गठन वित्तपोषित संस्थानों- आइआइटी व एनआइटी- में आत्महत्या रोकने के संबंध में किया गया था. चिंता की वजहें साफ थीं, इंडियन एक्सप्रेस (14 जनवरी, 2013) की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे संस्थानों में गत दो साल में 18 छात्रों ने आत्महत्या की कोशिश की, 12 ने आत्महत्या की, जिनमें से सात दलित, आदिवासी व पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते थे. उम्मीद की जानी चाहिए कि 2014 की ये ताजी घटनाएं उन्हें अपनी कार्ययोजना पर अधिक तत्परता से काम करने के लिए प्रेरित करेंगी.

वैसे अगर हम संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों पर आधारित आलेख, जो प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘लांसेट’ में प्रकाशित हुई थी, के निष्कर्ष को देखें तो पता चलता है कि युवा भारतीयों में आत्महत्या मृत्यु का दूसरा सबसे आम कारण है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत के संपन्न राज्यों के शिक्षित युवा इतनी बड़ी तादाद में मृत्यु को गले लगा रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है. यह पहला मौका नहीं है, जब हम इस कड़वी हकीकत से रूबरू हो रहे हैं.

पांच साल पहले एक रिपोर्ट में कहा गया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक उसके पहले के तीन सालों में 16,000 स्कूली एवं कालेज छात्रों ने आत्महत्या की. 2006 में 5,857; 2005 में 5,138, तो 2004 में 5,610 छात्रों ने आत्महत्या कीं. उस वक्त स्वास्थ्य मंत्री ने आश्वस्त किया था कि हम स्थिति की गंभीरता से वाकिफ हैं और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की नयी रूपरेखा तैयार कर रहे हैं.

प्रश्न उठता है कि देश-समाज के भावी कर्णधारों को किन दिक्कतों, चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनसे वे पढ़ाई के दबावों, अंतर्वैयिक्तक संबंधों या अन्य तनावों को ङोलने के बजाय जिंदगी से ही पलायन का रास्ता चुन रहे हैं. निश्चित ही तेजी से आर्थिक बढ़ोत्तरी कर रहे हमारे समाज में, जो 21 वीं सदी में आर्थिक महाशक्ति होने का इरादा पाले हुए है, अंदर कुछ घुन की तरह लगा है, जिस पर सोचना जरूरी है.

कुछ साल पहले जब आइआइटी कानपुर के छह छात्रों ने आत्महत्या की, चिंतित होकर आइआइटी से जुड़े चंद लोगों ने सूचना अधिकार के तहत जानना चाहा कि आखिर ऐसा कदम उठाने के लिए छात्र क्यों मजबूर हो रहे हैं. प्रबंधन का कहना था कि इंटरनेट, मोबाइल फोन आदि के चलते ये आत्महत्याएं हो रही हैं. उसके मुताबिक आधुनिकीकरण, सामाजिक असंतुलन, इंटरनेट व मोबाइल फोन का अतार्किक इस्तेमाल इन घटनाओं का मुख्य कारण है.

साथ में उसने माता-पिताओं को भी जिम्मेवार ठहराया, जो किसी भी सूरत में कामयाब होने के लिए अपनी संतानों पर दबाव डालते हैं. स्पष्ट था कि संस्थान का जवाब छात्रों के लिए बेहद असंतोषजनक था और इस बात का भी परिचायक था कि संस्थान इस मामले में अपारदर्शी एवं असंवेदनशील भी है.

दिल्ली विवि में विद्यार्थियों की काउंसिलिंग के कामों में एक दशक से मुब्तिला मंजुश्री इस सिलसिले में कुछ अहम कारकों की चरचा करती हैं. उनके मुताबिक मनुष्य बहुमुखी प्रतिभावाला व्यक्ति होता है, पर हमारे समाज तथा शिक्षा संस्थानों का स्वरूप ऐसा बना है कि उसमें विकल्प मौजूद नहीं है. आपने किसी पाठयक्रम में दाखिला लिया, तो आपकी यह मजबूरी बनती है कि आप वहीं आगे बढ़ें, भले बाद में आपको लगे कि उपरोक्त विषय आपकी रुचि के अनुकूल नहीं है.

प्रतियोगितात्मक वातावरण में छात्रों में उपजती आत्मविश्वास की कमी की भी वह चरचा करती हैं, जिसमें अपने सीमित दायरे में ही उन्हें सबकुछ साबित करना होता है. आम कॉलेजों की तुलना में प्रोफेशनल कोर्सेस के संस्थानों- आइआइटी, मेडिकल, मैनेजमेंट- में खुदकुशी के अधिक अनुपात के संदर्भ में वह इन संस्थानों के शेष समाज से अलग-थलग और विशिष्ट होने को भी जिम्मेवारी मानती है. इस संदर्भ में वह यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष मशहूर वैज्ञानिक यशपाल के उस सुझाव का हवाला देती हैं, जिसमें उन्होंने जोर दिया था कि इन विशेषीकृत संस्थानों में भी अन्य विषयों की भी पढ़ाई हो, ताकि छात्र अपने दायरे से बाहर की दुनिया देख सकें.

विशेषज्ञों में सहमति है कि तनाव, अवसाद और खुदकुशी की प्रवृत्ति से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है. पर एक पहलू हमेशा आड़े आता है, कि भारत में मनोचिकित्सकों की भी भारी कमी है.

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