बीएचयू के कुलपति ऊर्फ लड़कियों, हद में रहो

संदीप पांडेय
बीएचयू के प्रोफेसर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी को यह मानने में कोई संकोच नहीं कि जिन्दगीभर की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेवा के फलस्वरूप ही उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलपति पद मिला. प्रो. त्रिपाठी अपनी अकादमिक काबिलियत के लिए नहीं जाने जाते हैं. सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत अर्थशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूछ गए सवाल के जवाब में यह बताया गया कि विभाग के पास कोई जानकारी नहीं कि उन्होंने कितने शोध पत्र प्रकाशित किए अथवा कितने छात्र-छात्राओं के शोध कार्य को दिशा निर्देशित किया.

इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब उन्होंने परिसर पर 24 घंटे चलने वाली साइबर लाईब्रेरी के घंटे कम कर दिए क्योंकि उनके अनुसार रात में लड़के इंटरनेट का इस्तेमाल अश्लील तस्वीरें देखने के लिए करते हैं. लड़कियों को लेकर जो पाबंदियां उन्होंने लगाईं उनसे तो कई परम्परावादी लोग भी चकित रह गए. लड़कियों के छात्रावास के दरवाजे शाम 6 बजे बंद करने के निर्णय लिया गया, उनके ऊपर रात को 8 बजे के बाद मोबाइल पर बात करने पर पाबंदी लगा दी गई, मेस में मांसाहारी खाने पर प्रतिबंध लग गया और सबसे चौंकाने वाली बात कि हरेक छात्रा से विश्वविद्यालय के खिलाफ किसी भी प्रदर्शन में शामिल न होने का लिखित वचन लिया गया.


कुलपति महोदय के मुताबिक ये सारे नियम लड़कियों को संस्कारी बनाने के उद्देश्य से लागू किए जा रहे थे. उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के नियम लड़कों के लिए नहीं बनाए गए. या तो कुलपति महोदय यह मानते होंगे कि लड़कों को संस्कारी बनाना जरूरी नहीं अथवा उन्हें इस बात का अंदाजा होगा कि लड़कों को अनुशासित करना आसान न होगा. बहरहाल इन नियमों के क्रियान्वयन से विश्वविद्यालय का माहौल लड़कियों के लिए घुटन वाला हो गया. लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ की घटनाओं को नजरअंदाज किया जाता है या दबाने की कोशिश की जाती है. पता नहीं कुलपति किस तरह की संस्कृति बनाने की सोच रखते हैं. एक बात तो स्पष्ट है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के परिसर पर वर्चस्व व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में वृद्धि के बावजूद परिसर लड़कियों या महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं बन सका.

लड़कियों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम होते हुए भी 21 सितम्बर शाम छह बजे एक कला संकाय की छात्रा के साथ कुछ मोटरसाइकिल सवारों ने छेड़खानी की. पास खड़े सुरक्षाकर्मी ने मदद करने में असमर्थतता जताई और डीन व प्रॉक्टर ने उल्टा छात्रा को ही दोषी ठहराते हुए उससे सवाल किया कि वह इतनी देरी से क्यों बाहर घूम रही थी? छात्राओं में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई और अगर हजार नहीं तो सैकड़ों की तादाद में लड़कियां, उस अनुबंध को तोड़ते हुए जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल न होने पर हस्तक्षर किए थे, सड़क पर निकाल आईं और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना शुरू हो गया.

जब धरना शुरू हुआ तो प्रधान मंत्री अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी में ही थे. धरने के कारण उनको अपना मार्ग बदलना पड़ा किंतु उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. प्रधान मंत्री के प्रस्थान के बाद 23 सितम्बर को प्रशासन ने देर रात पुरुष पुलिस से छात्राओं पर गैर कानूनी रूप से लाठी चार्ज करवाया. कई छात्राओं को चोट आई और वे विश्वविद्यालय अस्पताल के ट्रॉमा सेण्टर में भरती की गईं.

भारत के संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति प्रकट करने के अधिकार की खुले आम धज्जियां उड़ीं. अहंकार में प्रशासन ने प्रदर्शन को कुचलना का निर्णय लिया. संवाद से समाधान निकालने जैसी प्रक्रिया में उनका विश्वास नहीं. शायद उन्हें सिखाया गया है कि संवाद कमजोरी की निशानी है और शक्ति से अनुशासन लागू करना बहादुरी की.

विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोप लगाया कि बाहरी, खुराफाती और राष्ट्र विरोधी तत्वों ने प्रदर्शन को भड़काया. उन्हें उन बाहरी लोगों की तो चिंता है जो विरोध को बढ़ावा दे रहे हैं किंतु उनकी नहीं जिन्होंने छात्रा के साथ छेड़-छाड़ की. शायद परिसर पर लड़की की छेड़खानी से ज्यादा बदनामी उन्हें अपने खिलाफ विरोध प्रदर्शन में नजर आती है.

24 सितम्बर को पुनः छात्र-छात्राओं पर परिसर के अंदर दो बार लाठी चार्ज हुआ. छात्र-छात्राओं को छात्रावास खाली करने के आदेश दिए गए हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इससे ज्यादा गैर-जिम्मेदाराना काम क्या हो सकता है? जो छात्राएं पुलिस द्वारा लाठी चार्ज के बाद सिर्फ छात्रावास में ही सुरक्षित महसूस कर सकती थीं उन्हें छात्रावास छोड़ने व बिना किसी रेल आरक्षण के अपने घर वापस जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने तीन वर्ष पहले वाराणसी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर और फिर परिसर पर स्थित उसी नाम के मंदिर में दर्शन कर कुलपति का कार्यभार सम्भाला था. अब उन्हें समझ में आ गया होगा कि विश्वविद्यालय का शिक्षक संघ या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा चलाने और विश्वविद्यालय संचालन में जमीन आसमान का अंतर है. लगता नहीं कि भगवान विश्वनाथ उनका बहुत दिनों तक साथ देने वाले हैं. उन्हें समझ में आ जाना चाहिए कि उनके दिन अब पूरे हो चुके हैं. एक अकादमिक विरोधी, महिला विरोधी, दकियानूसी ख्याल रखने वाले, प्रतिक्रियावादी व्यक्ति ने विश्वविद्यालय के माहौल को विषाक्त कर दिया है और आज विश्वविद्यालय को उसी के कुलपति से बचाने का समय आ गया है.

शुरू से ही प्रो. त्रिपाठी कुलपति बनाए जाने हेतु अयोग्य उम्मीदवार थे. ऊपर से उन्हें परिसर में ही स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के संचालक मण्डल के अध्यक्ष के रूप में भी तत्कालीन मावन संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने थोप दिया था जबकि मण्डल की ओर से भेजे गए पांच प्रस्तावित नामों में उनका नाम नहीं था. अक्षम होने के बावजूद प्रो. त्रिपाठी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपनी नजदीकी का फायदा उठाते हुए महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हो गए.

*लेखक मैगसेसे से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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