कांकेर में शिक्षा बेहाल

कांकेर | अंकुर तिवारी: कांकेर में शिक्षकों का अकाल बना हुआ है. आदिवासी बहुल बस्तर में सरकार भले ही शिक्षा की गुणवत्ता का बेहतर होने का ढिंढोरा पीट रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर शिक्षा की हालत ठीक-ठाक नहीं दिख रही है. कहीं बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तो कहीं झोपड़ी में स्कूल संचालित किया जा रहा हैं. खासकर ग्रामीण इलाकों में किये जा रहे सरकारी दावों से सब कुछ विपरीत ही है. बस्तर के अधिकांश स्कूलों में शिक्षकों का अकाल पसरा हुआ है. बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी हालत खराब है.

कांकेर ज़िले के कई स्कूल एक शिक्षक के भरोसे हैं. शिक्षक की कमी के चलते आदिवासी बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है. जाहिर है, ऐसे में एक सत्र के दौरान पूरे पाठ्यक्रम की पढ़ाई भी मुश्किल नज़र आ रही है.


उदाहरण के लिये अंतागढ़ विकासखंड के ग्राम अर्रा को ही लें. अर्रा के पूर्व माध्यमिक शाला में पढ़ने वाले करीब 60 छात्र-छात्राओं को शिक्षा देने का जिम्मा मात्र एक शिक्षक ने उठा रखा है.

अर्रा गांव के पास ही स्थित ग्राम पंचायत मातलाबा के प्राथमिक शाला और पूर्व माध्यमिक विद्यालय में करीब 30-35 बच्चे पढ़ाई करते हैं. जहां एक-एक शिक्षक ही स्कूल को संभाल रहे हैं.

शिक्षकों के अभाव से जूझ रहे विद्यालय के अधिकांश बच्चे इधर-उधर घूमते नजर आए. स्कूल के मुख्य द्वार पर ताला लटकता मिला और दोनों ही शिक्षक गायब दिखे. पूछताछ करने पर ग्रामीणों ने बताया कि दोपहर के डेढ़ बजे ही गुरुजी ने बच्चों की छुट्टी कर दी थी और खुद भी अपने घर चले गए थे.

ग्रामीणों की माने तो दोनों स्कूलों में बीते कई वर्षों से शिक्षकों के अधिकांश पद खाली पड़े हैं. गांववालों ने जिला प्रशासन से कई बार शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने की मांग की, लेकिन उनकी आवाज़ अब तक अनसुनी है.

झोपड़ी में स्कूल
अर्रा में जिस झोपड़ी में देश का भविष्य गढ़ा जा रहा है, उसमें छत के नाम पर सिर्फ खपरैल व टिन का शेड है. अहाते की जगह बांस का घेरा है. दूसरी ओर मातलाबा गांव के स्कूलों में सुविधाओं के नाम पर एक झोपड़ी में स्कूल खोला गया है. परिसर में शौचालय बदहाल है. कमरों का फर्श उखड़ गया है, खपरैल की छत से पानी टपकता है और दीवार जर्जर गई है, जो किसी बड़े हादसे की ओर इशारा कर रही है.

शिक्षकों के बगैर शिक्षा अकल्पनीय
ग्रामीण सैतूराम कावड़े कहते हैं कि शिक्षकों के बगैर शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती. क्योंकि जब विषयवार शिक्षक ही नहीं हैं तो बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं मिल सकती है. उन्होंने कहा कि विषयवार अध्यापकों के न होने से कई पाठयक्रम शुरू ही नहीं किए जा सके हैं. वहीं जो शिक्षक हैं भी, उन्हें बच्चों को पढ़ाने में रूचि ही नहीं हैं.

रिक्त पदों को भरने की मांग
अर्रा के पूर्व माध्यमिक शाला में पदस्थ शिक्षक सगाउराम तेता ने कहा कि शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए शासन से कई बार मांग की गई है. उसके बाद भी खाली पदों को भरने के लिए अब तक कोई पहल नहीं की गई है.

कैसे आएगी शिक्षा में गुणवत्ता?
ग्रामीण सोप सिंह ने बताया कि इस विद्यालय में 60 के लगभग छात्र-छात्रा हैं, मगर प्रशासन ने यहां पर केवल एक अध्यापक दे रखा है. यही शिक्षक छठवीं से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को पढ़ाते हैं. विभागीय बैठकों में जाने का मामला हो तो उस दिन स्कूल बंद रहता है.

सरकारी दावा
राज्य सरकार का कहना है कि बस्तर में शिक्षा के सुधार के लिये बड़ी संख्या में स्कूलों के युक्तियुक्तकरण कर समीपस्थ शालाओं में समायोजित किया गया है. इससे शिक्षा में सुधार भी आया है. राज्य के शिक्षामंत्री केदार कश्यप के अनुसार बस्तर के सभी सात ज़िलों के 539 प्राथमिक, 155 पूर्व माध्यमिक, 7 हाईस्कूल और 4 हायर सेकेंडरी स्कूलों को युक्तियुक्तकरण कर समीपस्थ शालाओं में समायोजित किया गया है.

लेकिन इस समायोजन से क्या हासिल हुआ है, इसकी हकीकत पोल अर्रा और मातलाबा के स्कूल उजागर कर रहे हैं.शिक्षाविद् डॉक्टर संजीव शुक्ला कहते हैं- बस्तर में भूख और अशिक्षा से लड़ना पहली प्राथमिकता है. सरकार की कोशिशें अपनी जगह ठीक है लेकिन इस पर अभी और काम करने की जरुरत है.

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