नसबंदी कांड में दो निलंबित

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित नसबंदी कांड में राज्य सरकार ने 6 साल बाद 2 सरकारी कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है. निलंबन की घोषणा बुधवार को विधानसभा में की गई. जिन दो अधिकारियों को 6 साल बाद निलंबित किया गया है, उनमें औषधिक निरीक्षक धर्मवीर सिंह और सहायक औषधि नियंत्रक राजेश खत्री शामिल हैं.

निलंबन की कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब एक दिन पहले ही स्थानीय अदालत में मामले की सुनवाई शुरु हुई है. पिछले महीने की 24 तारीख़ को बिलासपुर के ड्ग इंस्पेक्टर धर्मवीर सिंह ध्रुव ने महावीर फार्मा के संचालक रमेश महावर और कविता फॉर्मेसी के संचालक राकेश खरे के खिलाफ व्यवहार न्यायालय तखतपुर में अभियोजन पत्र प्रस्तुत किया था. ड्रग एवं कास्मेटिक एक्ट 1940 की धारा 17 बी डी व 18 ए1 धारा 27सी के अंतर्गत दाखिल किये गये इस अभियोजन पत्र के आधार पर मंगलवार 3 मार्च से सुनवाई शुरु हुई है. इस बीच बुधवार को विधानसभा में दो अधिकारियों को निलंबित किये जाने की घोषणा की गई.


हालांकि इन 6 सालों के बाद भी अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि 18 लोगों की मौत के लिये कौन ज़िम्मेवार है. मामले की न्यायिक जांच भी अब तक लंबित है.

गौरतलब है कि नवंबर 2014 में बिलासपुर के पेंडारी और पेंड्रा में नसबंदी शिविर में लापरवाही के बाद 13 महिलाओं समेत 18 लोगों की मौत हो गई थी. आरंभिक तौर पर सिप्रोसिन नामक टैबलेट को इन मौतों के लिये ज़िम्मेवार बता कर दवा ख़रीदी के लिये बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर के भांगे को बर्खास्त कर दिया गया था.

इसके अलावा नसबंदी करने वाले डॉ. आर के गुप्ता को भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. सरकार ने तीन डॉक्टरों और अधिकारियों को निलंबित भी किया था.

इसके बाद 13 नवंबर को सिप्रोसिन दवा के निर्माता मेसर्स महावर फार्मा के रमेश महावर व सुमीत महावर के खिलाफ मामला दर्ज़ किया गया और इनकी गिरफ़्तारी भी की गई.

19 नवंबर 2011 को केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला की जांच में सिप्रोसीन टैबलेट को अमानक बताया गया. इसके बाद केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कोलकाता ने अपनी 25 मई 2016 की रिपोर्ट में सिप्रोसीन को अमानक नहीं माना.

इस बीच 2017 में हाईकोर्ट ने नसबंदी करने वाले डॉक्टर आरके गुप्ता का नाम आरोप पत्र से हटाने का आदेश दे दिया. अदालत ने नसबंदी के बाद हुई मौतों के लिए डॉक्टर को ज़िम्मेवार नहीं माना.

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