कोयला खदान और छठी का दूध

प्रकाश चन्द्र पारख | अुनवादः दिनेश कुमार मालीः कोयला खदान के मामले में केवल दूबे और गिरधारी लाल ही ऐसे सांसद नहीँ हैं,वरन् बहुत सारे ऐसे सांसद है जो अपनी अवैध मांगों की पूर्ति न होने पर सरकारी उपक्रमों एवं प्रशासनिक अधिकारियों को परेशान करते रहते हैं.

दूसरा उदाहरण लीजिए, सांसद फुरकन अंसारी का, जो सीसीसल के सीमएडी श्री आर.पी. रितौलिया के पीछे लगे हुए थे. उनकी मांग थी कि जामतारा क्षेत्र के सौ मुसलमानों को सीसीएल में नौकरी देने की. जब सीएमडी ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उनके विरुद्ध झूठी शिकायत दूबे व अंसारी ने मिलकर प्रधानमंत्री से की. प्रधानमंत्री कार्यालय ने आवश्यक जाँचकर असत्य पाया और मुझे सलाह दी गई कि अंसारी को उचित तरीके से सूचित कर दिया जाए.


बात यहीं खत्म नहीँ होती है. बात चल रही थी सांसदों की, सांसदों के खेल के बारे में. सांसदों से ऊपर वाले लोग भी क्या अच्छे होते हैं?

वे लोग भी जब चाहे अपनी गंदी जुबान का प्रयोग करते हैं. उदाहरण के तौर पर श्री अनंत कुमार कोयला और स्टील की स्टैडिंग कमेटी के चेयरमैन थे. अपने किसी सगे संबंधी अधिकारी का सीआईएल में कहीँ ट्रांसफर करवाना चाहते थे. काम नहीँ करने पर सीआईएल चेयरमैन के लिए जिस बदजुबान का उन्होंने प्रयोग किया, वह आपकी सोच से भी परे होगा- ‘‘सीआईएल चेयरमैन और एमसीएल सीएमडी का ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीँ किया जाएगा, मेरी पार्टी बीजेपी देखेगी कि वे अपनी भूल स्वीकार करें और राजनेताओं का महत्त्व समझें. अगर साहा का अनुरोध नहीँ माना गया तो एक दिन चेयरमैन को पछताना पड़ेगा. शशि कुमार को मैं उनके अंतिम दस महीनों में ऐसा सबक सिखाऊंगा कि छठी का दूध याद आ जाएगा.’’

शशि कुमार का यह पत्र साफ दर्शाता है कि राजनेता किस तरह अपना काम निकलवाना चाहते है? दादागिरी के बल पर पीएसयू के अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार कर? श्री अनंत कुमार कभी मंत्री रह चुके थे. वह यह बात शायद भूल गए कि सरकारी उपक्रमों और प्रशासनिक अधिकारियों की अपनी सेवाओं के विषय में राजनैतिक प्रभाव डालना आचार संहिता का उल्लंघन होता है.

श्री साहा का कोलकाता से स्थानांतरण रुकवाने के लिए वह कदाचार को बढ़ावा दे रहे थे. वह तो यह भी भूल गए कि वह संसदीय स्थायी समिति के चेयरमैन है. उनसे कम से कम सच्चे और उदार व्यवहार की उम्मीद की जा सकती थी. शायद उनकी यह सोच थी कि इस समिति के चेयरमैन होने के नाते वह सीआईएल चेयरमैन को आदेश दे सकते है और अगर वह उनके आदेश को नहीँ मानता है तो उसे बुरे परिणामों के लिए धमकाया जा सकता है. मैंने राज्यमंत्री (कोयला) के द्वारा श्री अनंत कुमार के खिलाफ उचित कार्यवाही करने के लिए प्रधानमंत्री को एक नोट भेजा. यह मुझे मालूम नहीँ, उन्होंने वह नोट प्रधानमंत्री को भेजा अथवा नहीँ.

जब सोरेन ने दूसरी बार कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा दिया तो मैंने मौके का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री की सहमति से सारी कोयला कंपनियों में ई-ऑक्शन लागू करवा दिया. एमसीएल में ई-ऑक्शन का नोटिफिकेशन निकलने के बाद तालचेर कोयलांचल के बीजेपी सांसद धर्मेन्द्र प्रधान कुछ नॉन-कोर ग्राहकों को नोटिफाइड मूल्य पर कोयला दिलवाने हेतु मेरे पास आए.

मैंने उन्हें समझाया कि आक्शन का नोटिफिकेशन जारी होने के बाद किसी को भी नोटिफ़ाइड मूल्य पर कोयला नहीं दिया जा सकता.श्री प्रधान नाखुश हो गए. ई-ऑक्शन ने कोल बेल्ट में कालेधन के प्रवाह को काफी हद तक रोक दिया था. अपना गुस्सा उतारने के लिए श्री प्रधान ने मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति का सहारा लिया. अगस्त की शुरूआत में जब इस बैठक का आयोजन किया गया, तब धर्मेन्द्र प्रधान अपना आपा खो बैठे. उन्होंने मेरे ऊपर कुछ भद्दे कमेंट किए. राज्यमंत्री इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे, उन्हें टोकने के बजाये अपना विष-वमन जारी रखने दिया.

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कोल सेक्टर में सुधार करने हेतु लगातार भीतर-बाहर से विरोध झेलने के बाद भी मैं लगातार काम में लगा रहा. इसके के बावजूद जब एक सांसद मेरे ऊपर घटिया कमेंट करते है और कोयला राज्यमंत्री मूकदर्शक बन कर बैठे रहते है तो मेरे लिए इससे बड़ी निराशा और क्या हो सकती थी.

दूसरे ही दिन मैंने तत्काल प्रभाव से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए कैबिनेट सेक्रेटरी बी.के. चतुर्वेदी को एक पत्र लिखा,जिसके मुख्य अंश निम्न है- ‘‘5 अगस्त 2005 शुक्रवार को कोयला मंत्रालय की सलाहकार समिति की बैठक में ओड़िशा के सांसद धर्मेन्द्र प्रधान के व्यवहार से मुझे ऐसा लगता है कि किसी भी सिविल सर्विस के अधिकारी के लिए अपने आत्म-सम्मान, गरिमा और सत्यनिष्ठा के साथ काम करना बहुत मुश्किल हो गया है. मेरे लिए ऐसे कष्टदायक वातावरण में काम करना पूरी तरह से असंभव है और मैं कोयला मंत्रालय के सचिव के उत्तरदायित्व से तुरंत मुक्त होना चाहता हूँ. मेरे इस पत्र को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए मेरा प्रार्थना पत्र समझा जाए. इसकी स्वीकृति होने तक मैं 9 अगस्त 2005 से अर्जित अवकाश पर जा रहा हूँ.’’

सांसदों का रवैया दिन-प्रतिदिन बिगड़ता चला जा रहा है और वे अपने सामने सरकारी उपक्रमों अथवा प्रशासनिक अधिकारियों को कुछ भी तवज्जह नहीँ देते. अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति नहीँ होने पर अपना प्रतिशोध निकालने के लिए घटिया भाषा का इस्तेमाल करते है अथवा उन्हें ब्लैकमेल करते हैं.

17 अगस्त 2005 को मैं प्रधानमंत्री से मिला. मैंने उन्हें सांसदों द्वारा सरकारी उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों के अपमान और प्रताड़ना के बारे में मैंने विनम्रता पूर्वक प्रधानमंत्री से पूछा, “अगर सांसद भारत सरकार के सचिवों के साथ ऐसा बर्ताव कर सकते है तो युवा जिला अधिकारियों के साथ कैसा व्यवहार करते होंगे? अगर निर्वाचित जन प्रतिनिधि ब्लैकमेल और डराने-धमकाने का काम करेंगे तो जिला अधिकारी किस तरह से निष्पक्ष और सही ढंग से काम कर पाएंगे.’’

दुखी मन से प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘मुझे तो हर दिन ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है. अगर मैं हर ऐसे मुद्दे पर त्याग-पत्र दे दूँ तो इससे क्या राष्ट्रहित होगा?’’

मैंने प्रधानमंत्री की बात को बड़े ध्यान से सुना. उनके चेहरे पर विवशता की रेखाएँ साफ नजर आ रही थी. हालांकि उनकी व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा पर कभी भी कोई उंगली नहीँ उठा सकता. किन्तु फिर भी 2 जी और कोलगेट के घोटालों से उनकी छबि को काफी धक्का लगा. यदि वे अपने अधिकारों का दृढ़तापूर्वक प्रयोग करते तो इस घोटाले में नहीं होते.

प्रधानमंत्री ने मेरे प्रश्न का कोई भी समाधान तो नहीँ दिया, मगर मुझे पूरी तरह से सहयोग करने का आश्वासन दिया और मुझ पर अपना भरोसा जताया. उन्होंने मुझे सेवानिवृत्ति की याचिका वापस लेने की सलाह दी और अपनी तरफ से मेरे सेवानिवृत होने तक पूरा-पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया.

प्रधानमंत्री का आश्वासन पाकर मैंने उनकी सलाह मानते हुए 22 अगस्त 2005 को फिर से ऑफिस संभाला. मगर मुझे साफ-साफ लगने लगा था कि कोल सेक्टर में सुधार लाना आसान नहीँ है, क्योंकि प्रधानमंत्री की भी अपनी सीमाएं हैं.

संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में हुई दुर्भाग्य-पूर्ण घटना के तुरंत पश्चात श्री धर्मेन्द्र प्रधान ने अपने कदाचार को न्यायसंगत ठहराते हुए प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा. जिसका कोयला मंत्रालय के मेमोरेण्डम द्वारा प्रधानमंत्री को सटीक जवाब भेजा गया. श्री प्रधान का यह पार्ट इस बात की झलक दिखाता है कि हमारे चुने हुए नेता कितने अनभिज्ञ, असंयमित एवं प्रतिशोध लेने वाले हो सकते है?

श्री प्रधान ने मुझे सीआईएल चेयरमैन के प्रेजेंटेशन को सेंसर नहीँ करने का दोषी ठहराया. क्या उन्हें मालूम नहीँ था संसदीय सलाहकार समिति उन्मुक्त रूप से विचार विमर्श के लिए होती है और उसमें हर अधिकारी को अपनी बात रखने की आजादी होनी चाहिए. मंत्री या सचिव को उन्हें अपने विचार रखने से रोकना नहीँ चाहिए. श्री प्रधान ने अपने बचाव में पंडित नेहरू के लोकतांत्रिक समाजवाद का सहारा लिया, जिससे ना तो उनका, ना ही उनकी पार्टी बीजेपी का उससे कोई संबंध था. कितना मानते है बीजेपी के नेता जवाहरलाल नेहरू को? मगर कांग्रेस का प्रधानमंत्री देख कर उसे प्रभावित करने के लिए श्री प्रधान ने यह कदम उठाया. पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति के मुद्दे पर अपने गुस्से को जायज ठहराने के लिए उन्होंने मेरे वक्तव्य को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया.

उन्होंने सोचा, शायद यही एक बहाना है, जिसके कारण वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को अपमानित किया. सांसदों और विधायकों को यह समझना चाहिए कि संविधान उन्हें विशेषाधिकार सदन की गरिमा देखते हुए देता है. इसका मतलब यह नहीँ है कि वे किसी के भी साथ दुर्व्यवहार करें या उन्हें अपमानित करें. उनके दुर्व्यवहार और कदाचार से ना केवल उनकी छबि खराब होती है बल्कि सदन की छबि पर भी आँच आती हैं.

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