महंगी उदासीनता

भारतीय शहरों में मकान गिरने, आग लगने और दूसरी दुर्घटनाओं की जो खबरें आती हैं उससे लोग गुस्से से भर जाते हैं. इस तरह की आपदा या दुर्घटनाओं के बाद हर चीज एक तय ढंग से होती है. कई सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किए जाने की बात आती है. कसूरवारों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की बात दोहराई जाती है और सहानुभूति के कुछ शब्द उछाल दिए जाते हैं. दिसंबर 2017 में मुंबई में आग लगने की दो घटनाएं हुईं. 29 दिसंबर को एक पब में आग लगने से 14 लोगों की मौत हुई.

18 दिसंबर को एक स्नैक बनाने वाली एक इकाई में आग लगने से 12 मजदूरों की जान गई. इसके बाद जो हुआ वह अपेक्षित ही था. अवैध निर्माणों को तोड़ने का अभियान आनन-फानन में चलाया गया. इन दोनों मामलों से और सितंबर 2017 में मुंबई लोकल के एक स्टेशन पर मचे भगदड़ से यही संदेश निकलता है कि आपदा के मामले में अधिकारी और नागरिक दोनों उदासीन बने हुए हैं. शहरी नियोजन की कमी के साथ इसमें जन भागीदारी का अभाव भी स्पष्ट तौर पर दिखता है. लोग भी यह सोचते हैं कि कुछ नहीं बदल सकता.


फिक्की ने इंडिया रिस्क सर्वेक्षण 2017 में कारोबारों के लिए 12 जोखिमों की सूची दी है. आग लगना इनमें पांचवें स्थान पर है. 2016 में यह आठवें स्थान पर था. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि 2015 में 18,450 आग लगने की दुर्घटनाएं हुई थीं और इनमें 17,700 लोगों की जान गई. इसमें यह भी बताया गया है कि इनमें से 42.1 फीसदी मौतें रिहायशी भवनों में हुईं. सबसे ज्यादा 22 फीसदी ऐसी दुर्घटनाएं महाराष्ट्र में हुई थीं. फिक्की के सर्वे में भ्रष्टाचार, घूसखोरी और कॉरपोरेट धोखाधड़ी को तीसरे स्थान पर रखा गया है. इससे यह बात पता चलती है कि चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी जस की तस बनी रहती हैं.

निगम और सरकार के अधिकारी कठोर कार्रवाई की बात करते हुए पहले की जवाबदेही से पल्ला झाड़ने को सही ठहराते नजर आते हैं. लेकिन सच्चाई है कि पहले की ऐसी घटनाएं से कोई सबक नहीं लिया गया. 2015 में कॉलेज में पढ़ने वाले आठ छात्रों की मौत एक होटल में लगी आग की वजह से हुई थी. जिस होटल में वे खाना खाने गए थे, उसने नियमों की अनदेखी करते हुए कई बदलाव किए थे और गैस सिलिंडर गलत जगह पर रखा था. 1997 में दिल्ली में उपहार सिनेमा में लगी आग की वजह से 59 लोगों की मौत हुई थी.

2011 में कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में आग लगने से 89 लोगों की जान गई थी. सब जगह की वही कहानी है. लेकिन ऐसा लगता है कि लोग इन दुर्घटनाओं को जल्दी ही भूल जाते हैं. इन दुर्घटनाओं के बावजूद सुरक्षा मानकों में कोई बदलाव नहीं दिखता. तमाम होटलों, सिनेमा घर, रेस्टोरेंट, पब, औद्योगिक इकाइयों और रिहायशी परिसरों की यही कहानी है. सुरक्षा ठीक करने की किसी भी कोशिश को बिल्डरों और कारोबारियों द्वारा तंग किए जाने का प्रयास माना जाता है. स्नैक बनाने वाली इकाई में गैस सिलिंडर गलत ढंग से रखा गया था और उसी के बीच मजदूरों को सोना पड़ता था.

अब अधिकारी ये कह रहे हैं कि उस इकाई ने कोई जरूरी मंजूरी नहीं ली थी. इसी तरह कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने कमला मिल परिसर में हुए अवैध निर्माण की जानकारी अधिकारियों को दी थी. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई. मुंबई में पुरानी मिलों की जगह का इस्तेमाल दूसरे व्यावसायिक गतिविधियों के लिए करने के खेल में नेता भी साझेदार हैं. दूसरे शहरों में स्थिति कोई अलग नहीं है. इन सबके मूल में ठीक से नियमों को नहीं लागू किया जाना है.

इसमें जन भागीदारी की अहम भूमिका हो सकती है. अगर लोग जागरूक और चैकस रहें तो सुरक्षा मानक ठीक किए जा सकते हैं. एक तरफ तो सुरक्षा मानकों के प्रति सम्मान का भाव पैदा किया जाना चाहिए और दूसरी तरफ लोगों की तरफ से अधिकारियों और नेताओं पर सुरक्षा मानकों को ठीक से लागू कराने का दबाव होना चाहिए. इसके लिए सिविल सोसाइटी को सामने आना होगा. क्योंकि किसी आपदा के समय उदासीनता की महंगी कीमत चुकानी पड़ती है.
1960 से प्रकाशित इकॉनामिक एंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक का संपादकीय

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