क्या स्त्री, स्त्री है या फ़कत श्रीमती पुरुष ?

कनक तिवारी

पत्नी के चूड़ी पहनने, सिंदूर लगाने से इंकार पर गौहाटी हाईकोर्ट पति को कू्रता के आधार पर तलाक की अनुमति दे. मैं सहमत नहीं हूं.


स्त्री बनाम पुरुष अधिकारों की जांच करता एक बेहद दिलचस्प, विचारोत्तेजक और अभिनव मामला मध्यप्रदेश के एक न्यायालय में वर्षों पहले आया था. उसने स्त्री और पुरुष के संवैधानिक संबंधों को नये आयाम दिए. एक पत्नी के विरुद्ध पति ने हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (1) (बी) के अन्तर्गत तलाक हेतु न्यायालय में मामला दायर किया. पति का आरोप था कि पत्नी द्वारा लगातार तीन बार गर्भपात करा लिये जाने से उसके प्रति मानसिक क्रूरता हुई है. वह तलाक का अधिकारी है. घटना के गर्भ में महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों के बीजाणु थे. दरअसल मानवीय गरिमा और नारी की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलुओं के बिन्दु अभी भी मौन हैं.

न्यायालय में सवाल था बच्चों के अभाव में पति को पत्नी के साथ दाम्पत्य निर्वाह करने के लिये बाध्य किया जा सकता है या पत्नी के लिये वैधानिक तौर पर लाजिमी है कि वह विवाह के उपरांत पति के सहवास से संतानोत्तपत्ति करे ही? भले ही इस सम्बन्ध में उसकी खुद की अस्मिता, अस्तित्व और भूमिका का कोई अर्थ नहीं रहे. ऐसा भी था कि क्या हिन्दू विवाह अधिनियम जैसे कानून पुरुषपरक नहीं हैं?

पति नामक संस्था के पक्ष में मुख्यतः ये तर्क हुए होंगे:

1. पत्नी का दायित्व वह दाम्पत्य के निर्वाह के लिये पति की इच्छाओं का सम्मान और शारीरिक समर्पण भी करे.

2. धर्म और कानून दोनों ने संतानोत्पत्ति को विवाह का मूल उद्देश्य कहा है.

3. पत्नी को संतान की इच्छा नहीं हो लेकिन पति संतान चाहता हो, तो ऐसी स्थिति में पत्नी को पति के प्रति मानसिक कू्रता का दोषी ठहरा दिया जाए.

4. संतानहीन पत्नी पति से पूछे बगैर बार बार गर्भपात कराने की अधिकारिणी नहीं है. होने वाले बच्चे पर दोनों का अधिकार है. पति का अधिकार श्रेष्ठतर है. वह विधि के अनुसार संतानों का नैसर्गिक अभिभावक होता है.

5. स्त्री की महत्वाकांक्षा राजनीति, समाज या किसी क्षेत्र में जाने की क्यों न हो, परिवार के हितों की कीमत पर नहीं हो सकती. अन्यथा स्त्री पत्नी या मां जैसे पवित्र पद पर रहने की अधिकारी नहीं है.

6. संतान के अभाव में पति-पत्नी का शारीरिक सहवास केवल भौतिक क्रिया है. उससे परस्पर मानसिक द्वंद्व पैदा होने की संभावना है. वह अप्रत्यक्ष रूप से समाज के लिये हानिकर फेनोमेना है.

7. ऐसी समानान्तर स्थितियों में सर्वोच्च पद पर रही महिलाओं ने न केवल संतानों को जन्म दिया है, बल्कि उनका पालन पोषण भी किया है.

स्त्री जाति छूटते ही इन तर्कों का उत्तर देने की निम्न मुद्रा में तो खड़ी हो ही सकती थीः-

1. स्त्री भोग्य वस्तु नहीं है. वह पुरुष का नारी संस्करण मात्र नहीं है. उसकी अपनी अस्मिता, पहचान और अस्तित्व है.

2. संतानोत्पत्ति पारस्परिक निर्णय है. उसे पुरुष के तुरुप के इक्के के रूप में देकर स्त्री की हारती बाजी पर नहीं फेंका जा सकता.

3. संतानोत्पत्ति केवल सहवास का प्रतिफलन नहीं है. स्त्री को गर्भ धारण करने से बच्चे को जन्म देने तक की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है. इस पर स्त्री का अकेला अधिकार है कि बच्चे के सम्बन्ध में परिस्थितियां देखकर निर्णय करे.

4. राजनीतिक, सामाजिक महत्वाकांक्षाओं का अवसर स्त्री जाति के लिये नया आमंत्रण है. वह सदियों की गुलामी के बाद मिला है. सामाजिक जड़ताओं की आड़ में पुरुष फिर से अपनी लाठी से स्त्री को हकालने के आदिम अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता.

5. गर्भपात की प्रचलित कानूनी और नैतिक मान्यताएं स्त्री के नैसर्गिक अधिकार को खंडित नहीं कर सकतीं कि वह अपने शरीर, आत्मा, सामाजिक अस्तित्व और उपलब्धियों को केवल घिसीपिटी परिपाटी पर चलकर ढोती रहे.

विवाह, तलाक, गर्भपात जैसे जुड़े मुद्दों का कानून पुरुषों के बहुमत ने पुरुषपरक पूर्वग्रह से रचा है. जरूरत नये मूल्य और नया इतिहास गढ़ने की है, न कि पुराने चश्मों से नये मामलों को देखने की. कुछ नये विधायन स्त्री के पक्ष में अलबत्ता किए गए हैं. स्त्री खुद भी स्वेच्छा से बांझ कहलाने का सामाजिक अभिशाप उठाती है. आत्मा का यौन नहीं होता. उच्चतर आध्यात्मिक सिद्वान्त लिंग के आधार पर तय नहीं होते. सभ्यताएं तो मूलतः पुरुष के दम्भ से उपजी हैं. सांस्कृतिक विरासतें, कानूनी मान्यताएं स्त्री को अपेक्षाकृत कमजोर भी मानती रही हैं. पुराने मूल्यों को नवीनीकृत आधारों पर नहीं समझा जा सकता. कवियों, दार्शनिकों, योद्धाओं और नपुंसकों तक ने स्त्री को विभिन्न रूपों में देखा है. दरअसल पुरुषों की मानसिकता को सुधारने की जरूरत है. स्त्री की भूमिका के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने की जरूरत है. उसमें पुरानी सामाजिक वर्जनाओं का स्थान नहीं होना चाहिए.

संतान की यौनात्मक सम्बन्ध का परिणाम है. कानून केवल यौन तुष्टि के आधार पर मानसिक क्रूरता तय करने का अधिकार लिये पड़ा है. रिश्तों में आत्मा की गरमाहट के बारे में कानून के पंडितों ने कभी सोचा ही नहीं. कहते हैं अथर्ववेद में गर्भपात के सम्बन्ध में उल्लेख है. पता नहीं ऐसे गर्भभात प्रचलित नियमों के अन्तर्गत रहे होंगे अथवा उनके विरूद्ध.

हेहनेल नामक विद्धान ने अपनी पुस्तक ‘आर्टिफिशियल एबॉर्शन इन एंटीक्विटी‘ में प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के अध्ययन से पाया कि गर्भपात के सम्बन्ध में स्थिति तब भी स्पष्ट नहीं थी. लेकिन वशिष्ठ के धर्मशास्त्र में गर्भपात के सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख है. यह पुस्तक ईसा के एक सदी पूर्व लिखी गई थी. पी0व्ही काणे ने ‘धर्मशास्त्र के इतिहास‘ और फे्रंकलिन एडगर्टन ने भगवद्गीता की अपनी टिप्पणी में भी प्राचीन व्यवस्था का उल्लेख किया है. इस्लाम और ईसाई धर्मों के मतावलंबी अपना सारा इतिहास जानते हैं.

1971 में गर्भपात का कानून संसद ने रचा. उद्देश्य अवैध और नीमहकीमों द्वारा किये जा रहे गर्भपातों को रोकना था. अधिनियम की धारा 3 (2) में स्पष्ट उल्लेख है कि गर्भपात उस समय कानूनी तौर पर लाजिमी है, जब अन्य कारणों के अलावा गर्भ रहने से स्त्री की मानसिक सेहत के लिये वह खतरनाक हो. गर्भ का बोझ उठाते तो राजनीति में जोखिम भरे रास्तों पर नहीं चला जा सकता. लड़ते भिड़ते ऐसे विवाहित जोड़े उपहास नहीं व्यापक सामाजिक सहानुभूति के पात्र हैं. एक पत्नी बच्चे पैदा करने के बदले अपनी क्षमताओं के आकाश छू लेना चाहती है.

दूसरी ओर पति उसे संतानों की मां बनाकर उसके पर कतर देना चाहता है. एक ओर पत्नी अपनी महत्वाकांक्षाओं की आड़ में पति के साथ दाम्पत्य सम्बन्ध स्थापित करते भी गर्भपात जैसे कू्रर कृत्य के कारण पति के संभावित सुखी परिवार को तहस नहस करती जा रही है. यह एक अजीब गुत्थी है, विचित्र द्वंद्व है. दोनों ओर तर्कों की दोहरी और भोथरी तलवारें हैं.

आदिम सवाल है संविधान की दृष्टि में स्त्री क्या ’व्यक्ति’ नहीं है? क्या उसके लिये ऐसे कानूनों की रचना की जा सकती है, जहां उसे विचारों, तर्कों और सिद्धान्तों की मान्यताओं के सिलसिले में भी बराबर का हिस्सेदार बनाया जाये या उसके लिये अलग दुनिया बनाई जाये? ऐसे संभावित विवादों से इन स्थितियों का भी निर्माण हो सकता है, जहां बच्चे -जो भविष्य के नागरिक हैं- न तो स्त्री की जिम्मेदारी होंगे और न ही पुरुष की जरूरत.

फिल्म ’आंधी’ की नायिका एक महत्वाकांक्षी पत्नी के रूप में पति की जायज मांगों और प्यार को ठुकराकर छब्बे बनने के प्रयास में दुबे बनती नजर आई. वह फिर भी आगे बढ़ ही गई. वह फिल्म कटाक्ष की नहीं है. वह कहानी समानान्तर दिखने पर भी बहुत मोटे मोटे सवालों से ही उलझी रही. कई मामले उससे कहीं अधिक संवेदनशील रहे हैं. इंदिरा गांधी, गोल्डा मायर, बेनजीर भुट्टो, मारग्रेट थैचर और सिरीमाओ भंडारनायके ने मां होकर भी राजनीति और ममता के सर्वोच्च शिखर छुए. वे संभवतः सुखी दाम्पत्य जीवन की साक्षी रही होंगी.

इसके बावजूद स्त्री की अस्मिता, आजादी और महत्वाकांक्षा भावी इतिहास में इसलिये लिखी जाने को है क्योंकि इन महान हस्तियों ने भी पारिवारिक जीवन से समझौता ही किया था. उसके खिलाफ कोई जेहाद नहीं किया था.

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