हरियाणा की लड़कियां सिर्फ पढ़ना चाहती हैं

हरियाणा की लड़कियां हमें यह याद दिला रही हैं कि शिक्षा आधारभूत ढांचे से कहीं अधिक है.यह एक तरह का संक्रमण है. हरियाणा के रेवाड़ी जिले के गोत्र टप्पा दहिना गांवा की स्कूली छात्राओं ने जो किया, वह अब राज्य के दूसरे हिस्सों में फैल रहा है. 10 मई को यहां एक सरकारी स्कूल की 80 छात्राएं अनशन पर बैठ गईं. उनकी मांग यह थी कि उनके स्कूल को उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में तब्दील किया जाए.

इनका कहना था कि यहां से तीन किलोमीटर की दूरी पर जो ऐसा स्कूल है वहां उनके लिए जाना आसान नहीं है. क्योंकि एक तो आने-जाने की कोई परिवहन सुविधा नहीं है और दूसरे उन्हें रास्ते में छेड़छाड़ का भी सामना करना पड़ता है. राज्य सरकार को लगा था कि छोड़े ही दिनों में यह अभियान खत्म हो जाएगा लेकिन यह मामला बढ़ता गया और लड़कियों ने अनशन से उठने को मना कर दिया. दस दिनों के अंदर राज्य सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और गांव के उस स्कूल में 11वीं और 12वीं की भी पढ़ाई होगी.


इन लड़कियों का यह अभियान कई तरह से अलग था. वे उस राज्य की हैं जहां लड़कियों को बेहद पसंद नहीं किया जाता. हरियाणा का लिंग अनुपात देश में सबसे कम है. यहां 1000 पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 877 महिलाएं हैं. छह साल से कम आयु वर्ग में तो यह आंकड़ा 830 है. अगर यहां कोई लड़की पैदा होने के पहले या तुरंत बाद मारी नहीं जाती तो भी उसके लिए आगे का सफर आसान नहीं होता. क्योंकि यहां का रूढ़िवादी समाज लड़कियों पर कई तरह के नियंत्रण थोपे रहना चाहता है.

इसके बावजूद यहां से गीता फोगाट जैसे कुछ उदाहरण भी सामने आए हैं. ये यह दिखाते हैं कि तमाम बाधाओं के बीच महिलाएं काफी कुछ हासिल कर सकती हैं. लेकिन ये महिलाएं अपवाद हैं. सच्चाई वही है जो रेवाड़ी की लड़कियां कह रही हैं. वे तीन किलोमीटर की दूरी पढ़ाई करने के लिए इसलिए नहीं तय कर सकती हैं क्योंकि रास्ते में उनसे छेड़छाड़ होती है. ये लड़कियां जो कह रही हैं, वह झूठ नहीं है, इसे साबित करने के लिए हरियाणा में बलात्कार से संबंधित आंकड़े पर्याप्त हैं. 1971 के मुकाबले 2001 में हरियाणा में बलात्कार के मामले 873 फीसदी बढ़ गए हैं.

रेवाड़ी की स्कूली छात्राओं ने जो किया उसका पूरे देश के लिए महत्व है. यह हमें याद दिलाता है कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों के बावजूद हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में कई गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं. सच्चाई यह है कि ऐसे नारों और जमीनी हकीकतों में काफी अंतर होता है. हरियाणा की लड़कियों ने सुरक्षा का मुद्दा उठाया.

लड़कियां और पढ़ना चाहती हैं लेकिन न तो उन्हें और न उनके अभिभावकों को यह आत्मविश्वास है कि वे नजदीकी स्कूल तक सुरक्षिता आवाजाही कर सकती हैं. अगर हम उच्च माध्यमिक स्तर महिला नामांकन बढ़ाना चाहते हैं कि तो हमें इस स्थिति को ठीक करना होगा.

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नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले राज्य बिहार ने इस समस्या को समझा और इससे निपटने के लिए एक बिल्कुल अलग रास्ता निकाला.

2006 में उन्होंने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना की शुरुआत की. इसके तहत 9वीं कक्षा पास करने वाली हर लड़की को साइकिल दी गई ताकि वह 12वीं तक की शिक्षा पूरी करने नजदीकी उच्च माध्यमिक स्कूल तक पहुंच सके. हजारों लड़कियों को इसका फायदा मिला. नेशनल ब्यूरो आफ इकानोमिक रिसर्च ने अपने अध्ययन में बताया कि बिहार सरकार के इस कदम की वजह से 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी रखने वाली लड़कियों की संख्या 30 फीसदी बढ़ गई और उच्च माध्यमिक कक्षाओं में लड़कों और लड़कियों की संख्या का अंतर 40 फीसदी घट गया. इसके बाद कई राज्यों ने बिहार के उदाहरण को अपनाया.

सुरक्षा, पहुंच और अधिक नामांकन ऐसे हस्तक्षेप के जरूरी आयाम हैं लेकिन इससे भी कहीं अधिक किए जाने की जरूरत है. सबसे बड़ी चुनौती है सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना. उदाहरण के तौर पर बिहार में उच्च माध्यमिक कक्षाओं में लड़कियों की संख्या तो बढ़ी लेकिन बोर्ड परीक्षा पास करने की उनकी क्षमता सीमित बनी रही. समस्या की जड़ शुरुआती सालों में शिक्षा की गुणवत्ता है.

बिहार के सरकारी स्कूलों में 2016 में हुए एक सर्वेक्षण से यह बात निकलकर आई कि छठी कक्षा के 74 फीसदी छात्र अपनी पाठ्यपुस्तक भी नहीं पढ़ पा रहे हैं. इस तरह की बात गैर सरकारी संगठन प्रथम की असर रिपोर्ट में भी सामने आती रही है. शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 के तहत यह नीति बनी थी कि आठवीं कक्षा तक किसी छात्र को फेल नहीं किया जाएगा और उन्हें उनकी पढ़ाई में व्याप्त खामियों के बावजूद नौवीं कक्षा तक जाने दिया जाएगा.

दो सालों के अंदर उन्हें बोर्ड परीक्षा का सामना करना पड़ता है जिसके लिए वे बिल्कुल तैयार नहीं होते. इसके बावजूद यह सुखद है कि लड़कियों समेत सरकारी स्कूलों के कई बच्चे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं. यह बात स्थापित हो चुकी है कि महिलाओं के विकास में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है.

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार भी शिक्षा पर गंभीरता से काम कर रही है. सत्ता में आने के बाद के अब तक के दो सालों में इस सरकार ने शिक्षा पर आवंटन हर साल बढ़ाया है. इसने स्कूलों के बुनियादी ढांचे को दुरुस्त किया है. शैक्षणिक प्रक्रिया से शिक्षकों को जोड़ा है. साथ ही शिक्षकों के प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुधारने के उपाय भी किए हैं.

इन कोशिशों का क्या असर हुआ है, यह नतीजा निकालना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार ने दोनों स्तर बुनियादी ढांचे और शिक्षा की गुणवत्ता पर काम किया है. युवा भारत की गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा की मांग को पूरा करने के लिए इन दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक के संपादकीय का अनुवाद

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