महात्मा गांधी और हमारी अप्रसांगिकता

सोपान जोशी | फेसबुक: कोलकाता में एक चमत्कार बस हुआ ही था. दंगा करने वाले अपने हथियार जमा करवा रहे थे, प्रायश्चित की बात चल रही थी. हिंदू–मुस्लिम दगों की जिस आग को सरकार और पुलिस की सम्पूर्ण शक्ति नहीं बुझा सकी थी उसे मोहनदास गांधी के सत्याग्रह ने थाम दिया था. किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि 77 साल के एक आदमी ने मारकाट से झुलसते एक महानगर में शांति स्थापित कर दी थी.

कैसे? बस, भोजन छोड़ के, हिंसा न रुकने पर अपने प्राण त्याग देने के प्रण से. इसकी न तो कोई तुलना थी न ही इस नतीजे की कल्पना ही कोई कर सकता था. रेशम के एक धागे ने तलवार को काट दिया था. गांधीजी के हाथ में एक लाठी थी, चलते हुए संभलने के लिए. लड़खड़ाते हुए अपने देश को उन्होंने सत्य और अहिंसा की दो लाठियाँ का सहारा थमा दिया था.


गांधीजी को कोलकाता आये को लगभग एक महीना हो चुका था. इसी बीच देश आजाद हो गया था लेकिन गांधीजी स्वतंत्रता का उत्सव नहीं मना रहे थे. उन्हें दंगे रोकने थे. दिन था 5 सिंतबर, सन् 1947. यह एक बूढ़े वाला अग्निशमन दल दो दिन बाद ही दिल्ली के लिए रवाना होने वाला था. रेणुका राय नामक एक प्रसिद्ध शिक्षिका और कांग्रेस नेता ने गांधीजी से छात्रों के लिए कुछ सन्देश माँगा. उन्होंने चार–पाँच शब्दों का एक वाक्य बंगाली अनुवाद करवा के उन्हें थमवा दियाः “मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है.”

गांधीजी का जीवन ऐसे किस्सों से अटा हुआ है. उनका प्रभाव व्यापक और जादुई था लेकिन उनकी भाषा और विचार एकदम सीधे और सरल थे. यह युक्ति काम इसलिए करती थी क्योंकि गांधीजी ने सालों–साल इसकी साधना की थी. देखने वाले को सामने सिर्फ सहज–साधारण प्यार दिखता था, उसके पीछे दशकों की तपस्या से साधी हुई वीरता और सामाजिकता दिखती नहीं थी. गांधीजी की यह युक्ति इतनी नयी–ताजी थी कि हर तरह से असम्भव लगती है. ज्यादतर लोगों के लिए इसकी कल्पना कर पाना भी कठिन है. गांधीजी का जीवन हमारी कल्पनाशीलता के लिए चुनौती है. इसके दो कारण हैं.

पहला कारण है गांधीजी की मौलिकता. गांधी जीवन एक विराट प्रयोग था. इसमें पुराने देसी सामाजिक मूल्य खूब सारे थे लेकिन इसमें अफराता हुआ, इतराता हुआ राष्ट्रीय गौरव नहीं था. गांधीजी को एक बार किसी बात में अन्याय समझ आ जाता था तो वे उसे दूर करने में देर नहीं करते थे. अगर उन्हें कुछ भी गलत दिखता, तो उसे हटाने में और उसका विरोध करने में उन्हें देर नहीं लगती थी. फिर चाहे वह बात देसी हो या विदेशी. इसी तरह उन्हें जो बात न्याय संगत और सत्यपरक लगती थी उसे अपनाने में भी देर नही लगती थी, चाहे वह स्वदेशी हो या नहीं हो.

गांधीजी ने अपनी राजनीतिक विचारधारा नहीं गढ़ी. उनके मूल्य थे, उनका विश्वास था, उनका विचार था, राजनीतिक काम भी था. किन्तु कोई एक विचारधारा नहीं थी. उनके लिए राजनीति भी समाज में काम करने का एक माध्यम था. इसीलिए चाहे दूसरे लोग अपने–आप को ‘गांधीवादी’ बताएँ, गांधीजी खुद गांधीवादी थे कि नहीं यह पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता. जब उनसे कोई किसी गुरु की भाँति कोई मन्त्र या विचारधारा माँगता, तो वे कोई व्यावहारिक बात कहते, कुछ करने की बात करते. जब उनसे कोई राजनीतिक परिकल्पना या सिद्धान्त माँगता, तो वे कुछ ऐसी बात कह देते थे कि उनका जीवन ही उनका सन्देश है.

वे खुद कहते थे कि उनका लिखा किसी परिवेश में से उपजता है, जिसका भावार्थ देशकाल के हिसाब बदलता भी सकता है. इसलिए अगर उनके लिखे में कोई विरोधाभास दिखे, तो जो बाद में लिखा है उसे ही माना जाए. और अगर उनके लिखे और किये में कोई विरोधाभास दिखे, तो उनके लिखे की बजाए उनका किया हुआ ही प्रधान माना जाए.

इस तरह की सावधानी अनूठी है. इसके पीछे यह समझ है कि दुनिया बहुत जटिल बातों से बनी है और हमारा सामना कई अन्तर्विरोधों से होता रहता है. इसीलिए गांधीजी के लिए सत्य की साधना ही एकमात्र सहारा था. गांधीजी का सत्य जटिलता को नकारने वाला पोंगापन नहीं था, न ही किसी किताब की तोतारटंत. बल्कि उसमें तरह–तरह के प्रमाण और सामग्री को धारण करने की गहराई थी. उसमें पुरानी बढ़िया बातों को पकड़ के रखने की प्रतिबद्धता भी थी और नयी बातों को आत्मसात करने का लोच भी. इस असम्भव–सी बात को साधने में उन्होंने अपना जीवन लगाया.

दूसरी चुनौती हमारी समझ को है गांधी जीवन की व्यापकता से. अपने काम को निष्ठा से करने के लिए जो भी जतन, जितना भी शोध करना पड़े, गांधीजी करते थे. स्वास्थ्य, खेती, कारीगरी…कोई विषय नहीं मिलेगा जिसे उन्होंने किसी–न–किसी वजह से समझने की चेष्टा न की हो. अनगिनत लोगों के साथ उनका पत्राचार था और न जाने कितने लोगों से वे रोजाना मिलते थे.

वे जहाँ जाते थे वहाँ के पोस्ट ऑफिस का काम बढ़ जाता था और ऐसा भी उदाहरण है कि केवल उनकी वजह से अंग्रेज सरकार को पोस्ट ऑफिस खोलना पड़ा. वे हर चिट्ठी का जवाब देते थे. दुनिया भर की सामग्री उनके पास आती थी और उनके यहाँ से दूसरों को जाती थी. न जाने कितनी तरह की सामग्री वे लगातार मँगवाते रहते थे और इतनी ही सामग्री उनसे भी लोग मँगवाते थे.

इसी वजह से उनका लिखा जो संकलित हो सका वह ही एक सौ खण्ड के उनके वाङ्गमय में है. हर साल जितना उन पर लिखा जाता है, जितना नया शोध उन पर और उनके काम पर होता है, इतना दुनिया के किसी आधुनिक जीवन पर नहीं होता. हर साल नयी किताबें आती हैं जो विविध दृष्टि और परिवेश में गांधी जीवन और कर्मयात्रा के मायने टटोलती हैं. अनेक नये शोध पत्र हर साल छपते हैं. अनगिनत सभा–सम्मेलन और सेमिनार होते ही रहते हैं जिनमें शास्त्रीय विद्वान भी होते हैं और सामाजिक कार्यकर्त्ता भी. लेकिन गांधीजी का शोध अकादमिक नहीं था. वे कोई डिग्री या शास्त्रीय पदवी पाने के लिए या साहित्य की दुनिया में अपना झण्डा गाढ़ने के लिए नहीं लिखते थे.

उनकी भाषा की सरल शैली पर बहुत से लोगों ने लिखा है. उनके काम में शास्त्रीय ठसक नहीं, सहजता और साधरणता दिखती है. उनका शोध और लेखन अपने लोगों को, अपने समाज को समझने के ध्येय से की जाने वाली साधना का हिस्सा था. अपने आप में यह उनका साध्य नहीं था. इसलिए यह जरूरी नहीं है कि जिस किसी ने गांधी जीवन का शास्त्रीय अध्ययन किया हो वह गांधी विचार का सामाजिक काम करे. उसके लिए गांधीजी महज एक विषय भी हो सकते हैं. ठीक उसी तरह ऐसे लोग भी मिलते हैं जो न गांधीजी का नाम लेते हैं और न गांधीवादी कहे जाते हैं, लेकिन उनके काम और आचरण में गांधी विचार और सामाजिकता की सुगन्ध पता चलती है.

जो इतना मौलिक हो और इतना व्यापक हो, उसकी कल्पना करना आसान नहीं है. पिछली सदी के सबसे यशस्वी वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन ने शायद यह भाँप लिया था. तभी तो सन् 1944 में गांधीजी के जन्मदिन पर लिखे अपने सन्देश में उन्होंने कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़–मांस से बना हुआ कोई ऐसा कोई व्यक्ति भी धरती पर चलता–फिरता था.

आज वह पीढ़ियाँ जनम ले चुकी हैं. गांधीजी को समझने की हमारी सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि हमारी कल्पना की माँसपेशियों सिकुड़ चुकी हैं, कठोर हो गयी हैं. उनसे हम गांधीजी की कल्पना कैसे करें? कबाड़ और लोहे–लंगड़ का व्यापार करने वाले के पास स्वर्ण और जवाहर आ जाएँ, तो वह उसे कैसे बरते? उसके हथौड़े और तराजू किसी बहुमूल्य वस्तु को बरतने में काम आ ही नहीं सकते.

गांधी जीवन और कर्मयात्रा हमारी कल्पनाशीलता के लिए बड़ी चुनौती है. हर कोई इस चुनौती का सामना न कर सकता है और न करना चाहता ही है. ऐसे में आसान यह रहता है कि गांधी को अपनी सीमित कल्पना और सीमित ज्ञान की शीशी में उतार लें. गांधी को समझने के लिए अगर हम अपने मानस को खींच के बड़ा नहीं कर सकते, तो हम गांधी को अपने सीमित दायरे में तो बाँध ही सकते हैं. उसकी चूक बताने के लिए गांधीजी या उनके सहयोगी आज हमारे बीच हैं ही नहीं.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हमारे अनेक कार्यक्रमों का एक आई.एस.आई–मार्क विषयः “गांधी की प्रासंगिकता.” अंग्रेजी में “रेलेवेन्स ऑफ गांधी” के अनुवाद से आया यह जुमला कई कार्यक्रम–वीरों की मुश्किलें आसान कर देता है. हमारे यहाँ कई लोगों के लिए कार्यक्रम का आयोजन ही एकमात्र काम है. उन्हें कार्यक्रम अनेक करने होते हैं और तैयार वक्ता और विषय की उन्हें हमेशा दरकार भी रहती है. विषयों की मण्डी में “गांधी की प्रासंगिकता” सदाबहार जिन्स है. ऐसा लगता है कि हर भारतीय गांधीजी को इतना बढ़िया से जानता है कि वह उनके जीवन का, उनके काम का, उनके प्रभाव का मूल्यांकन कर सकता है. किसी तरह के अध्ययन की जरूरत नहीं, अपने आप से कोई कठिन प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं. ‘अरे, गांधीजी ही तो हैं!’

गांधीजी का नाम और चित्र हमारे चारों तरफ फैले हुए हैं. उनकी एक समाधी है जिस पर फूल चढ़ाना एक कूटनितिक रस्म बन चुकी है. गांधी जयन्ती और पुण्यतिथि कैलेंडर में टँकी हुई तारीखें हैं, जिन्हें कुछ लोग सिर्फ इसीलिए याद रखते हैं क्योंकि उस दिन शराब की दुकानें बन्द रहती हैं. गांधीजी के नाम पर चलने वाले कई गलत–सलत सुभाषितों से छात्रों के निबन्ध ही नहीं, राजनेताओं के भाषण भी आबाद होते रहते हैं. तरह–तरह के विज्ञापनों में गांधीजी की छवि माल बेचने के लिए इस्तेमाल होती है.

और तो और, स्वच्छता के नाम पर चलने वाले सरकारी कार्यक्रम की छवि साफ करने का काम भी गांधीजी के चश्मे से ही होता है. चाहे इस कार्यक्रम में अपने ही लोगों के खिलाफ हिंसा का उपयोग हो रहा हो और चाहे हमारे नदी–तालाब हमारे ही मल–मूत्र की वजह से, हमारी तथाकथित स्वच्छता की वजह से ही सड़ रहे हों.

गांधीजी के चश्मे का हम हर तरह का उपयोग करते हैं, बस उन्हें अपनी आँख के आगे लगा के उनमें से देखते भर नहीं हैं. इस चश्में में सत्य और अहिंसा का काँच लगा है जो हमें वह सब दिखला सकता है जिसे देखने से हम डरते हैं. वह दिखा सकता है कि हमारा अर्थतन्त्र दूसरों को गरीब बना के, पर्यावरण को दूषित कर के ही चलता है. वह दिखा सकता है कि हमारा स्वास्थ्य और शिक्षा तंत्र मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार से बीमार है.

वह दिखा सकता है कि जिस आर्थिक वृद्धि को हमने विकास मान लिया है, वह हमारे भविष्य को औने–पौने दाम पर नीलाम कर के ही प्राप्त होती है. यह भी कि हमारी राजनीति समाज में कुछ अच्छा करने का साधन नहीं बची है, सत्ता और महत्वाकांक्षा की साधना बन के रह गयी है. हमारे किसान–कारीगर हताश हैं, उनका रोजगार जा रहा है. हमारी आबादी के एक छोटे–से कुलीन हिस्से के विकास के लिए बाकी सब की बलि चढ़ रही है. हम विकास के नाम पर, धर्म के नाम पर, गोरक्षा के नाम पर, जाति के नाम पर, लिंग के नाम पर, भाषा के नाम पर, राष्ट्र के नाम पर…हिंसा ही कर रहे हैं.

इन सभी बातों के बारे में गांधीजी ने हमें सन् 1909 में ही आगाह कर दिया था, जब 40 साल की उम्र में उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ लिखी थी. उन्हें तभी पता था कि निरी राजनीतिक स्वतंत्रता से हम आजाद नहीं होंगे. उन्हें तभी आभास था कि अगर गरीब देशों ने भी यूरोप की तर्ज़ पर औद्यौगिक विकास अपना लिया, तो पृथ्वी के संसाधन नष्ट होंगे. गांधीजी के समय ‘पर्यावरण’ शब्द का चलन नहीं था लेकिन आज पर्यावरण संरक्षण पर काम करने वाले गांधीजी में लगातार प्रेरणा पाते हैं.

हमारा राजनीतिक तन्त्र, हमारे शोध संस्थान, हमारी व्यवस्थाएँ और नीतियाँ बनाने वाले शास्त्रीय विशेषज्ञों का सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन हो, तो साफ दिखता है कि ये सब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. किन्तु अपनी अप्रासंगिकता की बात साफ–साफ करने के लिए साहस चाहिए, यह डरपोक लोगों के बस का नहीं है.

उसे समझने के लिए धीरज और परिश्रम चाहिए, क्षमता और साधना भी. इन सब का योजन तभी हो सकता है जब हममें अपने समाज के लिए, अपने लोगों के लिए कुछ अपनापन हो, जो गांधीजी में था. अगर नहीं हो, तो हम गांधीजी की प्रासंगिकता पर चर्चा कर के काम चला सकते हैं. इससे हमारे कार्यक्रम तो निपट ही सकते हैं.

किसी भी व्यक्ति की प्रासंगिकता उसके जीते–जी ही होती है, जब उसके पास यह मौका हो कि वह किसी परिस्थिति के जवाब में कुछ कर सके. उसकी मृत्यु के बाद उसकी स्मृति शेष रह जाती है, उसकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है. उसके विचार की प्रासंगिकता इससे तय होती है कि उसका नाम लेने वाले उसे आचरण में लेते हैं या नहीं. जब जीवित लोग किसी दिवंगत की प्रासंगिकता पर इतना विमर्श करते हैं, तब कहा जा सकता है कि वे अपने-आप से ऊबे हुए हैं, कि यह विमर्श उनके लिए अपने आलस और अकर्मण्यता को ढँकने का प्रसंग है.

‘गांधी 150’ गांधीजी के मूल्यांकन का प्रसंग नहीं है. यह हमारे अपने मूल्यांकन का अवसर है. हम कितने प्रासंगिक हैं? क्या है हमारी प्रासंगिकता?

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