वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे

नागपुर की यादें बस इतनी ही. उसके अंतिम दृश्य को याद करता हूँ. आज भी जब कभी नागपुर रेलवे स्टेशन से गुजरता हूँ, या रुकता हूँ तो मुझे पिताजी सीढिय़ों से नीचे उतरते हुए दिखाई देते हैं. हम लोग राजनांदगाँव जाने के लिए पैसेंजर ट्रेन के डिब्बे में बैठे हुए थे. ट्रेन छूटने को ही थी कि पिताजी सीढिय़ों पर दिखाई दिए. माँ की जान में जान आई. वे आए और ट्रेन चल पड़ी. वह दृश्य कैसे भुलाया जा सकता है?

अब बात सन् 1957-58 की. हम राजनांदगाँव के बसंतपुर में रहते थे. शहर से चंद किलोमीटर दूर बसा गाँव. राजनांदगाँव भी इन दिनों बड़ा गाँव जैसा ही था. कस्बाई जैसा जहाँ कॉलेज थे, अस्पताल था, शालाएं थीं. शहरी चहल-पहल थी. शांत-अलसाया सा लेकिन सुंदर. दिल को सुकून देने वाली हवा बहती थी, लोगों में आपस में बड़ी आत्मीयता थी, भाईचारा था. पिताजी राजनांदगाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए थे और बसंतपुर से आना-जाना करते थे. कभी पैदल, कभी साइकिल से.


बसंतपुर में हमारा मकान था बढिय़ा. बाहर परछी, परछी से सटा छोटा कमरा जो पिताजी की बैठक थी, दो लंबे कमरे और पीछे रसोई तथा रसोई के बाहरी दीवारों से सटा खूब बड़ा बगीचा जिसमें फलों के झाड़ थे, सब्जियां उगाई जाती थी. यह मकान चितलांगियाजी का था और बगीचा भी उनका. बसंतपुर के दिन वाकई बहुत खूबसूरत थे. उसका सुखद अहसास अभी तक कायम है.

यहाँ रहते हुए कोई ऐसी घटना याद नहीं है जो पिताजी के व्यक्तित्व को नए ढंग से रेखांकित करती हो. अलबत्ता वे कितने पारिवारिक थे वह जरुर जाहिर होता है. रात को कंदिल की रोशनी में वे हमें पढ़ाते थे. क्लास लेते थे. वक्त-वक्त पर मेरे साथ शतरंज खेलते थे. जानबूझकर मुझे जीताते थे. शाम को कॉलेज से घर आने के बाद शायद ही कभी शहर जाते हो. यानी उसके बाद उनका पूरा समय हमारा था. हमारे साथ वक्त बिताते. बाते करते या फिर हाथ में किताब या कागज कलम लेकर लिखने बैठ जाते.

बसंतपुर में हम ज्यादा दिन नहीं रहे. शायद साल-डेढ़ साल. राजनांदगाँव महाविद्यालय परिसर में अंतिम सिरे पर स्थित शीर्ण-जीर्ण लेकिन महलनुमा मकान में रंग-रोगन चल रहा था, हम यही शिफ्ट होने वाले थे. एक दिन शिफ्ट हो गए. पुराने जमाने के बड़े-बड़े कमरों और मंजिलों वाला नहीं था – नया मकान. दरअसल राजनांदगाँव बहुत छोटी रियासत थी इसलिए महल भी साधारण थे. नीचे एक अलग-थलग कमरा जहाँ बड़े भैया रमेश पढ़ाई करते थे, दूसरे छोर पर प्रवेश कक्ष और ऊपर की मंजिल पर तीन हालनुमा कमरे, एक रसोई और खुली बालकनी. खिड़कियां बड़ी-बड़ी व दरवाजों के पल्ले भी रंग-बिरंगे काँच से दमकते हुए. पिताजी ने जिस कक्ष में अपनी बैठक जमाई वहाँ छत पर जाने के लिए चक्करदार सीढिय़ां थी जो उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अंधेरे में’ प्रतीक के रुप में है. इसी कक्ष में वे लिखते-पढ़ते, आराम करते थे. जब कभी दादा-दादी राजनांदगाँव आते, उनका डेरा भी यही लगता था. दादाजी के लिए पलंग था, दादी फर्श पर बिस्तर लगाकर सोती थी. यहाँ उनकी उपस्थिति के बावजूद लिखते या पढ़ते वक्त पिताजी की एकाग्रता भंग नहीं होती थी. शुरु-शुरु में दादाजी का पलंग प्रवेश द्वार यानी भूतल पर स्थित कक्ष में रखा गया था ताकि बाथरुम तक जाने के लिए उन्हें कष्ट न हो. लेकिन पिताजी के लिए यह भी एक प्रकार से मिनी बैठक ही थी.

वे देर रात तक लिखते और सुबह होने पहले उठ जाते. करीब 4 बजे. हमें भी जगाते थे ताकि हम पढऩे बैठे. लिखने के लिए बैठने के पूर्व चाय उनके लिए बेहद जरुरी थी. कोयला रहता था तो सिगड़ी जलाते थे या फिर रद्दी कागजों को जलाकर खुद चाय बनाते थे. कभी-कभी यह काम हम भी कर देते थे. सिगड़ी के आसपास बैठना, या फिर कागज जलाकर चाय बनाने में अलग आनंद था. आग की रोशनी में पिताजी का चेहरा दमकता रहता था. वे इत्मीनान से कंटर भर (पीतल का बड़ा गिलास) चाय पीते और फिर लिखने बैठ जाते थे. यह सिलसिला सुबह 8 बजे तक चलता था. फिर उनके कपड़े, इस्त्री करने का काम मेरा था. पैजामा-कुर्ता और कभी भी खादी की जैकेट भी.

दोपहर हो, शाम हो या फिर रात. लिखते-लिखते जब वे थक जाते, मुझसे जासूसी किताब मांगा करते तनाव मुक्त होने के लिए. मुझे उन दिनों जासूसी किताबें पढऩे का इतना शौक था कि दिन में एक किताब खत्म हो जाती. जासूसी दुनिया, जासूसी पंजा, रहस्य, जे. बी. जासूस, गुप्तचर, मनोहर कहानियां आदि. लेखकों में इब्ने सफी बीए, ओमप्रकाश शर्मा, निरंजन चौधरी, बाबू देवकीनंदन खत्री आदि. जासूसी दुनिया के लेखक इब्ने सफी बी. ए. उन्हें पसंद थे और उनके पात्र कर्नल विनोद, केप्टन हमीद को वे याद करते थे. वेदप्रकाश काम्बोज के भी जासूसी उपन्यास उन्हें अच्छे लगते थे. हिन्दी में रहस्य -रोमांच के उपन्यासों के अलावा वे अंग्रेजी के डिटेक्टिव नॉवेल भी खूब पढ़ा करते थे. पैरी मेसन, आर्थर कानन डायल और भी बहुत सी किताबें वे पढऩे के लिए कहीं से लाते थे. मेरे लिए उनकी यह पसंद एक सुरक्षित व्यवस्था थी क्योंकि मुझे जासूसी किताब को कापी के भीतर छिपाकर पढऩे की जरुरत नहीं पड़ती थी. माँ की डाट-फटकार से भी, मैं बचा रहता था. मुझे तब और अच्छा लगता था जब वे मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर रेखाओं को पढऩे की कोशिश करते. मेरी हथेली की रेखाएँ बहुत कटी-पिटी हैं और अंगूठा काफी चौड़ा. मेरी माँ के अंगूठे जैसा. वे तल्लीन होकर देखते थे, बताते कुछ नहीं थे. जाहिर है ज्योतिष भी उनकी रुचि का विषय था, साइंस की तरह.

पिताजी प्राय: रोज सुबह-सुबह, अखबार के आते ही, नीचे उतर आते थे और दादाजी को अखबार की खबरें पढ़कर सुनाया करते थे. खबरों पर लंबी-लंबी बाते होती थीं. घंटे दो घंटे कैसे निकल जाते थे, पता ही नहीं चलता था. कॉलेज से लौटने के बाद शाम को भी वे दादाजी के पास बैठते थे. बातें करते थे. हमारी दादी को पढऩे का बहुत शौक था. पिताजी कॉलेज की लायब्रेरी से उनके लिए उपन्यास-कहानी संग्रह लेकर आते थे. मुझे पढऩे का चस्का दादीजी की वजह से हुआ. किताबें आती थी, मैं भी देखता-परखता था. कुछ-कुछ पढ़ता भी था. बंकिम चटर्जी, शरतचंद्र, प्रेमचंद, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, आचार्य चतुरसेन, वृंदावन लाल वर्मा और यशपाल भी मेरे प्रिय लेखक थे.

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