भंसाली की पद्मावत यानी ऊंची दुकान का फीका पकवान

प्रियंकर पालीवाल | फेसबुक : पद्मावत (पूर्व में पद्मावती) फिल्म इतिहास नहीं है. ऐसा फिल्म के प्रारंभ में ही घोषित कर दिया गया है. पद्मावत फिल्म जायसी के प्रेममार्गी महाकाव्य का फिल्मांकन भी नहीं है. सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां प्रेम कुछ कम-कम है और वासना या कामना का पसारा थोड़ा ज्यादा. बल्कि इसलिए कि कहानी ठीक-ठीक पद्मावत की कथा का भी अनुकरण नहीं करती. तो कह सकते हैं कि कुछ इतिहास,कुछ जनश्रुतियों,कुछ साहित्य और ज्यादा भंसालियत की खिचड़ी है यह फिल्म.

संजय लीला भंसाली की यह संभवतः सबसे कमजोर फिल्म है. ऊपर से थ्री डी में यह फिल्म मुझे तो किसी फंतासी-एनीमेशन फिल्म जैसी लगी. सुरीले पार्श्व संगीत और रेतीले इलाके के सुनहरे परिवेश के मनमोहक छायांकन के अलावा बहुत कम है जिसे सुंदर-स्वाभाविक कहा जा सके.


अगर रणवीर-दीपिका-शाहिद जैसे नामचीन नायक-नायिका न होते तो यह फिल्म सचमुच एनीमेशन फिल्म के स्तर पर आ जाती. अलाउद्दीन खिलजी के रूप में रणवीर सिंह ने एक अहमन्य-आत्मविश्वासी किंतु दुस्साहसी और ‘ईविल इनकारनेट’ (?) को रूपायित करने की कड़ी कोशिश की है.

ढलवां कंधे वाले शाहिद कपूर राणा रतन सिंह के रोल में कहीं से नहीं फबे,बल्कि खलनायक के मुकाबले दबे-दबे और चूजा मार्का लगते रहे. नाम पद्मावत हो या पद्मावती, दीपिका को वैसे ही कुछ खास करने को नहीं था. राणा के साथ दाम्पत्य-जीवन के प्रेमिल प्रसंगों में ज़रूर उन्होंने अच्छा अभिनय किया है. घूमर नृत्य और उसका संयोजन-फिल्मांकन भी बेहतर-सुंदर है.

भंसाली के कुछ लटके भी हैं जो अब फिल्म दर फिल्म पुराने पड़ते जा रहे हैं. बाजीराव मस्तानी में रणवीर सिंह पर फिल्माया गया समूह नृत्य-गीत ‘मल्हारी’ और रणवीर पर ही फिल्माया गया पद्मावत का ‘खलीबली’ दरअसल भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित होने के बावजूद तात्विक रूप से एक ही तरह का नृत्य-संगीत है जो ढीली-ढाली पटकथा को सहारा देने का — त्वरा देने का — काम करता है. ताल-वाद्यों के प्रयोग से समृद्ध इन नर्तन-सीक्वेंसों का इस्तेमाल फिलर के रूप में है, भले मूल कथा से उनका कोई आवयविक संबंध हो न हो. नायक नाचे या खलनायक इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता. बस उद्दाम ऊर्जा दिखनी-छलकनी चाहिए.

पर इस औसत फिल्म ने प्रदर्शन के पहले ही कई वर्गों का जैसे मुलम्मा उतार दिया है. सिर्फ अकल से पैदल किस्म की करणी सेनाओं और किसी भी किस्म के कट्टरपंथ के आगे दुम हिलाती शासन-प्रशासन-व्यवस्थाओं का ही नहीं, सती-प्रथा की आड़ में जौहर पर विचारहीन किस्म की टिप्पणी करते प्रगतिशील बुद्धिजीवियों से लेकर टुटपूंजिया किस्म के नारीवाद से सी.वी. समृद्ध करती प्रचारशीलाओं तक, सबका. सब के सब जैसे संभ्रम में भंसाली के साथ खड़े दिखे.

पद्मावत को नायिका-प्रधान फिल्म होना था. फिल्म का नाम पद्मावती होने पर भी ऐसा होना संभव नहीं था, ऐसे संकेत फिल्म से मिलते हैं. कुछ के लिए रतनसिंह नायक हैं तो कुछ के हिसाब से अलाउद्दीन खिलजी के रूप में रणवीर ने अलाउद्दीन के दुर्दम व्यक्तित्व को निभाते हुए जैसे नायकत्व छीन-सा लिया है. कुछ अतिउत्साही किस्म के मित्र मेटाफिजिकल कवियों की कंसीट्स की तरह पुरोहित राघवचेतन को नायकत्व प्रदान करने की अनुशंसा करते दिखाई देते हैं. हालांकि प्रतिनायक या खलनायक अगर महाकाव्य-नायक हुआ करते तो भारतीय काव्यशास्त्र शीर्षासन की अवस्था में खड़ा मिलता और देश में रामायण के नहीं, रावणायन के तीन सौ संस्करण मिलते दिखाई देते.

उद्दाम वासना और अवांछनीय कामना के आवेग से बजबजाते समय और समाज में इन आदिम प्रवृत्तियों का आईना सामने रखना कैसा और कितना प्रभाव छोड़ेगा मुझे नहीं पता. पर स्वाभिमान और प्रेम, खासकर दाम्पत्य-प्रेम और त्याग-भावना ही है जो इस कथा या फिल्म को देखने के बाद शेष बचती और मन पर असर छोड़ती है. पद्मावती की कहानी सिर्फ पद्मावती और रतनसिंह की प्रेमकथा ही नहीं है, वह गोरा और बादल के शौर्य और बलिदान की कथा भी है.

किलों-कंगूरों और महलों-रनिवासों की तमाम भव्यताओं और राजे-रजवाड़ों की कथित महानताओं और विलास-लीलाओं के बावजूद पद्मावत देखने के बाद निस्सारता का वही बोध साथ बचता है जिसे जायसी ने महसूसा था. और याद आईं टॉमस ग्रे की एलेजी की वे पंक्तियां :

The boast of heraldry, the pomp of power,
And all that beauty, all that wealth e’er gave,
Awaits alike the inevitable hour.
The paths of glory lead but to the grave.

अपने-अपने खेमों और विचार-सरणियों में सुख-लाभ लेते डॉग्मैटिक विद्वानों को अमीर खुसरो की तरह इसमें अपने-अपने इस्लाम की विजय या पराजय जैसा बहुत कुछ दिख सकता है पर मेरे मन में तो इस विजुअल पद्मावत-पारायण के पश्चात जायसी बाबा की वे उपसंहारात्मक पंक्तियां ही गूंजती रहीं :

छारि उठाइ लीन्हिं एक मूंठी
दीन्हिं उड़ाइ पिरथिमी झूठी
जौ लगि ऊपर छार न परई
तब लगि नाहिं जो तिस्ना मरई

(उसने एक मुट्ठी धूल उठा ली और पृथ्वी को झूठी करार देते हुए हुए उसे उड़ा दिया. और कहा कि जब तक मनुष्य के ऊपर धूल नहीं पड़ती है तब तक उसकी तृष्णा नहीं मिटती.)

कहां सुरूप पदुमावति रानी
कोई न रहा जग रही कहानी
धनि सो पुरुख जस कीरति जासू
फूल मरै पै मरै न बासू

(वह सुरूपा रानी पद्मावती अब नहीं है. जगत में हमेशा कोई नहीं रहता है. बस उसकी कहानी रहती है. वह व्यक्ति धन्य है जिसका यश और कीर्ति बनी रहती है. फूल झर जाता है पर उसकी सुगंध बनी रहती है.)

प्रेम की पीड़ा के काव्य को समझने-समझाने के लिए थोड़ी ज्यादा संवेदनशीलता चाहिए होती है. जाति-धर्म-इलाका आदि-आदि को अतिक्रमित करती संवेदनशीलता. जो हमारे समय को देखते हुए थोड़ा मुश्किल काम है.

सीमा फूल की हो सकती है, सुगंध की कैसी सीमा !

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