सरकार ! वन्य पशुओं को बचाए

कनक तिवारी | फेसबुक
यू.पी.ए. सरकार के वक्त कई विकास प्रोजेक्ट पर्यावरण की हरी झंडी के रेल सिग्नल देखते खड़े रहे. मोदी सरकार ने हजारों करोड़ रुपयों के 140 औद्योगिक प्रस्तावों को आनन फानन में हरी झंडी दिखा दी. मोदी ने अपने चुनाव अभियान में पर्यावरण मंत्रालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की ढिलाई की आलोचना की ही थी.

जंगलों की एक बड़ी समस्या 2006 में पारित वन अधिकार अधिनियम और वन्यजीवों की सुरक्षा तथा पर्यावरणीय अनुकूलताओं की पारस्परिक सुसंगतता का है. एक पक्ष के अनुसार वनवासियों को संरक्षित वन क्षेत्र में रहने बसने की पूरी आजादी होनी चाहिए. दूसरा पक्ष वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर इसे खतरनाक प्रयोग बताता है.


केन्द्र द्वारा गठित एन.सी. सक्सेना कमेटी ने संरक्षित वन क्षेत्र में विस्थापित हो रहे वनवासियों के अधिकारों को तरजीह देते सिफारिश की कि सरकार इन क्षेत्रों से नियंत्रण हटा ले. वनोत्पादों को लेकर ग्राम सभाओं के नियंत्रण में लचीली और व्यावहारिक बाज़ार सक्षम नीतियां बनाई जाएं.

अनुभव रहा है कि राष्ट्रीय पार्क और अभ्यारण्य कमोबेश समाप्त हो रही वन्य पशुओं की प्रजातियों के कम से कम अनाथालय तो रहे हैं. एक शेर को औसतन वर्ष भर में लगभग तीन हजार किलो का जीवित मांस चाहिए, साथ ही प्राकृतिक वनों का स्थायी सहवास भी. यदि वनवासियों और अन्य मनुष्यों को अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय पार्कों में अबाधित अधिकार दे दिए गए तो दुर्लभ प्रजातियों के वन्य पशुओं का जीवन अंधकारमय हो जाएगा.

मनुष्य के साथ रहना वन्य पशुओं को जीवन का अभिशाप लगता है. देश के वन मनुष्य के हस्तक्षेप के कारण तेजी से सिकुड़ रहे हैं. प्रकृति के संतुलन में अब भी खतरों की छोटी बड़ी पुनरावृत्तियां संभावित हैं, जो केदार घाटी में हुईं.

पूर्वोत्तर राज्यों में वनों का अधिकतर प्रबंधन आदिवासी स्वायत्त परिषदों के तहत है. फिर भी वन्य पशुओं के अस्तित्व, स्वास्थ्य और भविष्य की हालत चिंताजनक है. रीता बनर्जी और शिल्पी शर्मा की डॉक्युमेंटरी फिल्म ‘द वाइल्ड मीट ट्रेल‘ में आदिवासी जातियों की हिंसक और मांसाहारी वृत्तियों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण किया गया है. उन्हें जीवन के लिए वनोत्पाद और शाकाहारी आहार होने पर भी वन्य पशुओं का वध और व्यापार करना सुहाता है.

इसके बरक्स सरकारी संरक्षण में पनपते रहे संरक्षित वन क्षेत्र कॉरबेट, कान्हा, काजीरंगा और बंदीपुर वगैरह में अब भी वन्य पशुओं के जीवन और हिफाजत की उम्मीदें मरी नहीं हैं. अर्थ यह नहीं है कि सरकारी संरक्षण में सब कुछ ठीक ठाक ही है. सरिस्का और पन्ना के अभ्यारण्यों में टाइगर की प्रजाति गायब हो रही है. सरकारी संरक्षित क्षेत्रों में तरह तरह के कुप्रबंधन हैं. वहां सुधार की गुंजाइशें ही गुंजाइशें हैं. देश में 47 टाइगर रिजर्व ही बचे हैं.

भारत में लगभग 600 संरक्षित वन क्षेत्र हैं. उनका क्षेत्रफल देश के कुल भूमि क्षेत्र का तीन से चार प्रतिशत ही होगा. इन वन क्षेत्रों में विस्थापित वनवासियों को व्यवस्थापित करने के निर्णय हुए तो वन्य एवं अन्य पशुओं के जीवन संरक्षण का सवाल पेचीदा हो सकता है.

इन इलाकों में खनिजों की अंधाधुंध खुदाई, कारखानों की स्थापना और बड़े बांधों के निर्माण हो रहे हैं. समूचे आदिवासी विकास परिदृश्य को संदिग्ध किया जा रहा है. संरक्षित वन क्षेत्रों में थोड़ी भी छेड़छाड़ करने की गुंजाइशें अब नहीं बचीं.

सिविल सोसायटी में कुछ आग्रही और कर्तव्यनिष्ठ नौजवान तथा ​विशेषज्ञ सामने आ रहे हैं. उनकी उपस्थिति वन्य पशु जीवन के लिए संजीवनी का काम कर सकती है. प्रधानमंत्री, उद्योगपति और विकास का नारा बुलंद करने वाले नौकरशाह तो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष अधिकारयुक्त समिति को भी खारिज करते हैं.

विकास आधुनिक और वैज्ञानिक समाजचेता परिकल्पना है और पर्यावरण संरक्षण पारंपरिक जीवन को बनाए रखने का एक अवैज्ञानिक आग्रह- यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर यह तर्क गढ़ा गया है.

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