मोदी ने बोली सांप्रदायिक बोली

राजेंद्र शर्मा
पिछले हफ्ते यूपी पर अपनी टिप्पणी हमने एक सवाल के साथ खत्म की थी. हालांकि, हमारा सवाल रेहटारिकल था, इसी बीच उसका यथार्थवादी जवाब आ गया है. सवाल यह था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के उत्तरोत्तर ज्यादा से ज्यादा मुखर रूप से सांप्रदायिक होते चुनाव प्रचार में, प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को कब तक रोक पाएंगे? जवाब है, सात चरणों के विधानसभाई चुनाव के मध्य भाग में पहुंचने तक! रविवार, 19 फरवरी को जिस समय विधानसभाई चुनाव के तीसरे महत्वपूर्ण चरण में सेंट्रल यूपी में वोट पड़ रहे थे, उसी समय फतेहपुर में, फतेहपुर व बांदा की विधानसभाई सीटों के लिए भाजपा की चुनाव रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी, बेधडक़ उस सांप्रदायिक तुरुप को चल रहे थे, जिसे इस चुनाव में उन्होंने इससे पहले तक बचाकर रखा हुआ था.

फतेहपुर की सभा में, जो जिस क्षेत्र में मतदान हो रहा हो, उसके ठीक बगल के इलाके में बहुप्रचारित तथा टेलीविजन प्रसारित चुनाव सभा करने और उसके जरिए, मतदाताओं को ऐन आखिरी घड़ी में प्रभावित करने की कोशिश करने की, नरेंद्र मोदी की अब तक जानी-पहचानी हो चुकी कार्यनीति की ही एक और मिसाल थी, इस सांप्रदायिक तुरुप के इस्तेमाल से दुहरे लाभ की भाजपा को उम्मीद रही हो सकती है. इसके जरिए, चुनाव के शेष चरणों के लिए भाजपा के चुनाव प्रचार के आधिकारिक स्वर को तो स्पष्ट किया ही जा रहा था, खुद तीसरे चरण के लिए भी अपना अंतिम अस्त्र आजमाया जा चुका था. समाजवादी पार्टी का गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में, इस अस्त्र का आजमाया जाना भाजपा के लिए इसलिए और जरूरी हो गया लगता था कि 2012 के चुनाव में, इस चरण में मतदान करने वाली 69 सीटों में से, 54 पर समाजवादी पार्टी ने ही जीत दर्ज करायी थी.


फतेहपुर की सभा में सारा संकोच छोडक़र, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनकर, बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ भेदभाव होने की सरासर सांप्रदायिक शिकायत करने और बहुसंख्यकों को इसका भरोसा दिलाने की हद तक चले गए कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का ही राज उन्हें भेदभाव से बचाएगा. कम से कम देश के प्रधानमंत्री होने के नाते, नरेंद्र मोदी इससे अपरिचित नहीं हो सकते हैं कि देश भर में और उत्तर प्रदेश में भी अल्पसंख्यकों की और खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति क्या है? सच्चर कमेटी समेत, इस मुद्दे पर अब तक गठित सभी कमेटियों, आयोगों तथा सर्वेक्षणों से एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है कि आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक, सभी पहलुओं से वंचितता के पैमाने से मुसलमानों की स्थिति, बहुसंख्यक समुदाय के वंचित दलितों-आदिवासियों से भी खराब है. इस स्थिति में अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण और बहुसंख्यकों के साथ भेदभाव की शिकायत को, बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक दुहाई के सिवा और कुछ नहीं माना जा सकता है.

देश के सर्वोच्च न्यायालय के अपने हाल के फैसले में एक बार यह दुहराने के बाद कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है और उसमें सांप्रदायिक दुहाई के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जा सकती है, चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के खुलकर सांप्रदायिक दुहाई का सहारा लेने का स्वयं संज्ञान लेकर, कार्रवाई करता है या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन, इतना साफ है कि है यह सांप्रदायिक दुहाई का सहारा लेने का मामला ही. प्रधानमंत्री ने कहा था: ‘‘गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो (हिंदुओं के लिए) श्मशान भी बनना चाहिए. रमजान में बिजली देते हो तो होली पर भी बिजली दो. भेदभाव नहीं होना चाहिए. ईद पर बिजली देते हो तो दीवाली पर भी दो!’’ यह भी अगर सांप्रदायिक दुहाई का इस्तेमाल नहीं है तो सांप्रदायिक दुहाई का इस्तेमाल किसे कहेंगे?

जाहिर है कि यह कोई संयोग नहीं था कि सात चरण के विधानसभाई चुनाव के तीसरे चरण तक आते-आते पीएम का धैर्य छूट गया हैं और वह खुलकर आरएसएस के प्रचारकों की जानी-पहचानी भाषा बोलने लगे हैं. अमित शाह की अगुआई में आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, निरंजन ज्योति, विनय कटियार, संजीव बलियान आदि, चुनाव प्रचार की शुरूआत से ही खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक भाषा बोल रहे थे और इस सांप्रदायिक भाषा का ताप लगातार बढ़ता जा रहा था. उन्होंने एक तरह से अपने सर्वोच्च स्टार प्रचारक के लिए मंच सजाकर रखा हुआ था कि वह आए और सांप्रधायिक ध्रुवीकरण का राग प्रस्तुत करे.

प्रधानमंत्री मोदी ने फतेहपुर की सभा में इन तैयारियों को उनकी फलप्राप्ति तक पहुंचाने का ही काम किया. कहने की जरूरत नहीं है कि यहां से आगे उत्तर प्रदेश में भाजपा का चुनाव प्रचार बेधडक़, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल खेलता नजर आएगा और विकास के नारों और वादों का खेल तेजी से पीछे खिसकते हुए, अंतत: उसी तरह से गायब हो जाएगा, जैसे भाजपा के चुनाव प्रचार से नोटबंदी के ‘साहसपूर्ण कदम’ का बखान करीब-करीब गायब ही हो गया है. अचरज नहीं कि नरेंद्र मोदी की फतेहपुर सभा के बाद अमित शाह ने ‘‘संप्रदाय और जाति पूछकर’’ लैपटॉप बांटे जाने से लेकर, सपा-बसपा में मुस्लिम गुंडे बैठे होने तक के आरोपों को ही अपने प्रचार की मुख्य धार बना लिया है.

यह दिलचस्प है कि चुनाव के बीचो-बीच प्रधानमंत्री के खुलकर बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक का सहारा लेने के पहलू से भी, उत्तर प्रदेश का मौजूदा चुनाव, करीब डेढ़ साल पहले हुए बिहार के विधानसभाई चुनाव को ही दोहराता नजर आता है. बिहार के चुनाव में भी शुरूआती चरण निकल जाने के बाद, जाहिर है कि चुनाव अपने हाथ से निकलता देखकर, हताश भाजपा के बदहवास शीर्ष नेता की हैसियत से, नरेंद्र मोदी ने खुद सांप्रदायिक दुहाई के उपयोग की कमान संभाली थी. तब महागठबंधन पर, दलितों, पिछड़ों आदि के आरक्षण में से एक हिस्सा छीनकर ‘एक खास समुदाय’ (मुसलमान) को देने का आरोप लगाने और भाजपा के ऐसा अन्याय हर्गिज नहीं होने देने का भरोसा दिलाने के जरिए ही, प्रधानमंत्री ने बहुसंख्यक समुदाय को गोलबंद करने की कोशिश की थी.

वही काम अब बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ भेदभाव के सरासर झूठे और वास्तव में बेतुके दावों लिया जा रहा है. और भी पीछे 2002 के नरसंहार के बाद गुजरात में हुए विधानसभाई चुनाव में वही काम ‘हम पांच, हमारे पच्चीस’ जैसे नारों से और मुख्यत: बेघर कर दिए गए मुसलमानों के शरणार्थी शिविरों को ‘बच्चे पैदा करने की फैक्टरियां’ करार देने के जरिए किया गया था. थीम बदलती रहती है, पर नरेंद्र मोदी का सांप्रदायिक राग, उनकी गद्दी बदल जाने के बावजूद नहीं बदला है.

जाहिर है कि नरेंद्र मोदी का यह राग छेडऩा न तो अकारण है और न सिर्फ किसी खब्त का मामला है. इसके पीछे साफ तौर पर इसका एहसास काम कर रहा है कि 2014 के आम चुनाव में मोदी की तस्वीर के तले, थोड़े से हिंदुत्ववादी छोंक के साथ, विकास और बदलाव का जो नारा कामयाबी के साथ चलाया जा सका था, अब काम नहीं कर रहा है. वैसे तो बिहार के विधानसभाई चुनाव के समय तक ही बहुत हद तक नरेंद्र मोदी के विकास पुरुष के मुखौटे का रंग उतर चुका था, जिसका सबूत लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में, भाजपा के प्रदर्शन में जमीन-आसमान का अंतर था.

लेकिन, बिहार के विधानसभाई चुनाव के बाद गुजरे डेढ़ बरस में तो जनता के सामने इस मुखौटे की पोल और खुल गयी है. वास्तव के नितीश कुमार की तरह, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने, भाजपा के चुनाव प्रचार से विकास का झंडा तो करीब-करीब पूरी तरह से ही छीन लिया लगता है. ठीक इन्हीं हालात में प्रधानमंत्री ने अब यूपी में चुनाव प्रचार में अपना सांप्रदायिक राग छेड़ा है. इस चुनाव में अंतत: उत्तर प्रदेश में बिहार वाला नतीजा दोहराया जाता है या नहीं, यह तो मतगणना के बाद ही पता चलेगा, लेकिन नरेंद्र मोदी का यूपी में बिहार दांव खेलना बताता है कि आसार कुछ ऐसे ही बन रहे हैं. भाजपा भले सांप्रदायिक धु्रवीकरण की बढ़ती हुई कोशिशें कर रही हो, उसके इस दांव को बहुसंख्यक समुदाय के भी ज्यादा पसंद करने में काफी शक की गुंजाइश है.

(लेखक के निजी विचार हैं.)

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